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उलझन बुलझन प्यार
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199

Age Recommendation: Above 12 Years
ISBN: 978-93-92829-26-0 SKU: SV2022 Category:

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anurag.eib

समीक्षा किताब की उपन्यास : उलझन बुलझन प्यार लेखक : भुवनेश्वर उपाध्याय प्रकाशक : साहित्य विमर्श पेज : 164 अक्सर हम जैसे कुछ लोग किताब के कवर डिजाइन या नाम से ही अपने अंदर कहानी का चित्र बना लेते हैं । " उलझन बुलझन प्यार "में भी मेरे साथ ऐसा ही हुआ। जब से इस किताब का कवर और नाम पढ़ा तब से ही इसके प्रति आकर्षण हो रहा था । किताब का कवर और टाइटल बहुत खूबसूरत है इसलिए मैं यह मान चुका था कि ये एक अच्छी प्रेम कहानी है। अब जब पूरी किताब 4 घंटे में मैंने पढ़ ली यह एहसास हो रहा है की ये सिर्फ प्रेम कहानी नहीं है , यह उपन्यास प्रेम कहानी के साथ साथ सामाजिक रिश्ते के ताने बाने में बुनी हुई एक अलग ही लेवल की कहानी है। शुरुआत की आधी किताब की कहानी रोचक प्रेम कहानी बनती जाती है जिसमें नया पन बहुत है । बाकी दूसरा भाग प्रेम कहानी के साथ साथ आज लगभग खत्म हो रहे रिश्तों के नीव को बचाने और उसे कहानी के माध्यम से समझने की बेहतरीन कोशिश दिखाई पड़ती है। आसान हिन्दी की भाषा में लिखी गई कहानी में हसी मजाक भी बहुत दिखाई पड़ते हैं। कहानी की रफ्तार अच्छी है इसलिए एक बार पढ़ना शुरू करते हैं तो बीच में रुकने की जरूरत महसूस नहीं होती। लेखक ने इस उपन्यास के जरिए मां बाप और बच्चों के बीच के अंतर्द्वंद्व को भी चिन्हित किया है। युवा पीढ़ी और मां बाप के लिए भी इस उपन्यास को पढ़कर कुछ सीखने और अच्छा करने की संभावना दिखाई पड़ती है। कहानी के पात्र जया, निशांत , राजू और पिंकी के साथ साथ भावेश जी मुख्य भूमिका में नजर आते हैं। पढ़ते हुए ऐसा लगेगा की अगर यह कहानी फिल्मी पर्दे पर आई तो भावेश के किरदार में आपको पंकज त्रिपाठी दिखाई देंगे। कहानी बहुत से खूबसूरत पंक्तियों से भरी हुई है जैसे कि - 1. दुनियादारी के रिश्ते, यथोचित व्यवहार के अभाव में अक्सर दम तोड़ देते हैं। 2. हम सामने वाले से क्या चाहते हैं ये हमें पता होना चाहिए, तब गलतियों की संभावना बहुत कम हो जाती है। 3. इस दुनियां में कई रास्ते ऐसे होते हैं, जिनकी कोई मंजिल नहीं होती, मगर इनमें आकर्षण बहुत होता है । कुल मिलाकर यह जरूर पढ़ी जाने वाली किताब है। किताब अमेजन , फ्लिपकार्ट और साहित्य विमर्श पर भी उपलब्ध है। जरूर पढ़ें । धन्यवाद। - अनुराग वत्सल ( नई वाली हिन्दी )

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    anurag.eib (सहपाठी)

    समीक्षा किताब की
    उपन्यास : उलझन बुलझन प्यार
    लेखक : भुवनेश्वर उपाध्याय
    प्रकाशक : साहित्य विमर्श
    पेज : 164

    अक्सर हम जैसे कुछ लोग किताब के कवर डिजाइन या नाम से ही अपने अंदर कहानी का चित्र बना लेते हैं । ” उलझन बुलझन प्यार “में भी मेरे साथ ऐसा ही हुआ। जब से इस किताब का कवर और नाम पढ़ा तब से ही इसके प्रति आकर्षण हो रहा था । किताब का कवर और टाइटल बहुत खूबसूरत है इसलिए मैं यह मान चुका था कि ये एक अच्छी प्रेम कहानी है। अब जब पूरी किताब 4 घंटे में मैंने पढ़ ली यह एहसास हो रहा है की ये सिर्फ प्रेम कहानी नहीं है , यह उपन्यास प्रेम कहानी के साथ साथ सामाजिक रिश्ते के ताने बाने में बुनी हुई एक अलग ही लेवल की कहानी है। शुरुआत की आधी किताब की कहानी रोचक प्रेम कहानी बनती जाती है जिसमें नया पन बहुत है । बाकी दूसरा भाग प्रेम कहानी के साथ साथ आज लगभग खत्म हो रहे रिश्तों के नीव को बचाने और उसे कहानी के माध्यम से समझने की बेहतरीन कोशिश दिखाई पड़ती है। आसान हिन्दी की भाषा में लिखी गई कहानी में हसी मजाक भी बहुत दिखाई पड़ते हैं। कहानी की रफ्तार अच्छी है इसलिए एक बार पढ़ना शुरू करते हैं तो बीच में रुकने की जरूरत महसूस नहीं होती। लेखक ने इस उपन्यास के जरिए मां बाप और बच्चों के बीच के अंतर्द्वंद्व को भी चिन्हित किया है। युवा पीढ़ी और मां बाप के लिए भी इस उपन्यास को पढ़कर कुछ सीखने और अच्छा करने की संभावना दिखाई पड़ती है। कहानी के पात्र जया, निशांत , राजू और पिंकी के साथ साथ भावेश जी मुख्य भूमिका में नजर आते हैं। पढ़ते हुए ऐसा लगेगा की अगर यह कहानी फिल्मी पर्दे पर आई तो भावेश के किरदार में आपको पंकज त्रिपाठी दिखाई देंगे। कहानी बहुत से खूबसूरत पंक्तियों से भरी हुई है जैसे कि –
    1. दुनियादारी के रिश्ते, यथोचित व्यवहार के अभाव में अक्सर दम तोड़ देते हैं।
    2. हम सामने वाले से क्या चाहते हैं ये हमें पता होना चाहिए, तब गलतियों की संभावना बहुत कम हो जाती है।
    3. इस दुनियां में कई रास्ते ऐसे होते हैं, जिनकी कोई मंजिल नहीं होती, मगर इनमें आकर्षण बहुत होता है ।

    कुल मिलाकर यह जरूर पढ़ी जाने वाली किताब है।
    किताब अमेजन , फ्लिपकार्ट और साहित्य विमर्श पर भी उपलब्ध है। जरूर पढ़ें । धन्यवाद।

    – अनुराग वत्सल
    ( नई वाली हिन्दी )

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    Abhishek Singh Rajawat (सहपाठी)

    नयी hindi के नाम पर लिखे जाने वाले आजकल के उपन्यासों से कहीं जायदा बेहतर…

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कभी-कभी आँखों के सामने अचानक कुछ ऐसा घटित हो जाता है जो सोचने पर मजबूर कर देता है कि ऐसा आखिर हुआ क्यों? ये प्रश्न केवल मस्तिष्क में ही नहीं उठता, बल्कि कहीं न कहीं समाज और उसके बनाये रिश्तों को भी कटघरे में खड़ा कर देता है, और निर्देशित करता है कि जो है उसके बारे में पुनः सोच और व्यवहार, कर्तव्यों के निर्धारण से पहले व्यक्तियों और परिस्थितियों को भी परिभाषित करो, वरना कोई भी घुटता और पीड़ा महसूस करता हृदय विद्रोही होकर अपने रिश्तों को नकार देगा।

उलझन बुलझन प्यार  की कहानी ऐसे ही एक कठोर, मगर नग्न यथार्थ का भावनात्मक और संवेदनशील तानाबाना है जिसमें रिश्तों के मध्य प्रेम और विद्रोह का उलझाव केवल जीवन को ही जटिल नहीं बनाता, बल्कि कटुताएँ बढ़ाकर जीवन में रेतीली शुष्कता भी पैदा कर देता है। कभी-कभी विश्वासों से उपजी धारणाओं के कारण भी लोग शुष्कता ओढ़ लेते हैं, किंतु भीतर रची बसी भावनाओं की नमी से भी इनकार नहीं किया जा सकता इसलिए इसमें कुछ ऐसे ही भावनात्मक और मानसिक परिवर्तनों की झलक भी दिखाई देती है।

रिश्तों में इतनी सामर्थ्य नहीं होती कि वे प्रेम की परिभाषा गढ़ सकें, जबकि प्रेम कुछ भी गढ़ सकता है। अंकुरण, प्रेम का स्वभाव है जो परिस्थितियों के अनुकूल होते ही उग आता है, परंतु ये उसकी तक़दीर है कि वह दीवारों पर उगे पौधों की तरह सूख जायेगा या फिर किसी मैदान में बढ़कर विशाल वृक्ष की तरह फूलेगा फलेगा। परिणाम की चिंता से दूर प्रेम धारा के विपरीत किसी अपवाद की तरह मिल ही जाता है। उलझन बुलझन प्यार की कहानी ऐसे ही किसी अपवाद की कहानी है, साथ ही प्रेम की कोमलता और रिश्तों के कठोर यथार्थ का तार्किक विश्लेषण भी करती है।

भुवनेश्वर उपाध्याय जन्म तिथि – 08/02/1979 शिक्षा – एम. ए. (हिंदी साहित्य) लेखन – कविता, कहानी, उपन्यास, व्यंग्य, लेख आदि के साथ साथ आलोचनात्मक एवं समीक्षा लेखन 1999 से .... प्रकाशन – ◆कविता संग्रह – दायरे में सिमटती धूप, समझ के दायरे में ◆व्यंग्य संग्रह –बस फुँकारते रहिये ◆कहानी संग्रह – समय की टुकड़ियाँ, फिर वहीं से.... ◆उपन्यास – एक कम सौ , हॉफमैन , महाभारत के बाद , जुआ गढ़ ◆संपादित पुस्तक – व्यंग्य-व्यंग्यकार और जो जरूरी है ◆देश के विभिन्न स्तरीय समाचारपत्रों एवं पत्रिकाओं में कहानियों, कविताओं, व्यंग्यों, लेखों, साक्षात्कारों और समीक्षाओं का निरंतर प्रकाशन एवं विभिन्न महत्वपूर्ण साझा संकलनों में सहभागिता ◆“भुवनेश्वर उपाध्याय : समीक्षा के निकष पर (संपादक – डॉ. मुदस्सिर सय्यद)” कृतित्व पर पुस्तक प्रकाशित” ◆शोध - पीएचडी के लिए शोध कार्य आरंभ ◆पाठ्यक्रम – स्वामी रामानंद तीर्थ मराठवाड़ा विश्वविद्यालय, नांदेड़ के बीए.द्वितीय वर्ष के पाठ्यक्रम में रचना शामिल संप्रति – स्वतंत्र लेखन सम्मान – श्रेष्ठ युवा रचनाकार सम्मान २०१२ , लखनऊ, मधुकर सृजन सम्मान 2018, दतिया ('समझ के दायरे में' कृति को) एवं सारस्वत सम्मान पता – डबल गंज सेवढ़ा, जिला-दतिया, मध्यप्रदेश - 475682 मोबाइल– 07509621374 , 8602478417 email - bhubneshwarupadhyay@gmail.com