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tareekh mein aurat
प्रकाशक: संभावना प्रकाशन

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Age Recommendation: Above 16 Years
ISBN: 978-9392621147 SKU: SM2581 Category:

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Tareekh Mein Aurat – औरत ने कुदरत को सँवारकर रखने में अपनी हिस्सेदारी निभाई क्योंकि उसका जन्म ही सृजन के लिये हुआ था। उसने युद्ध नहीं रचे। उसे इसकी फ़ुरसत ही नहीं थी। तमाम तरह की विभीषिकाओं के बीच और उनके गुज़र जाने के बाद भी उसने जीवन के बीज बोए। इसके लिये उसे कभी किसी अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता नहीं रही। यह और बात है कि न जाने कब से पिलाई जाती रही त्याग, ममता और श्रद्धा की घुट्टियों ने उसके अस्तित्व को इस कदर बांधा कि वह आज तक इन्हीं छवियों में मुक्ति तलाशती आ रही है।

बहुत मुमकिन है आपने इस किताब में आने वाली औरतों में से अनेक के नाम न सुने हों। जीवन की भयानक त्रासदियों से गुज़रकर वे टूटीं, गिरीं और फिर उठकर खड़ी हुईं। ज़रूरी नहीं कि उन्हें किसी के सामने ख़ुद को किसी तरह साबित ही करना था लेकिन उन्होंने ज़िंदगी चुनी। उनमें से एक-एक हमारे ही भीतर लुक-छुपकर बैठी है, हमारे-आपके आसपास की औरत है। इस औरत ने बड़े एहतियात से तमाम शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक संघर्षों के बीच अपनी राह बनाई है। अशोक पाण्डे इसी औरत का हाथ थाम लेते हैं। —स्मिता कर्नाटक

Book Details

Weight 250 g
Dimensions 14 × 3 × 22 cm
Pages:   248

Tareekh Mein Aurat – औरत ने कुदरत को सँवारकर रखने में अपनी हिस्सेदारी निभाई क्योंकि उसका जन्म ही सृजन के लिये हुआ था। उसने युद्ध नहीं रचे। उसे इसकी फ़ुरसत ही नहीं थी। तमाम तरह की विभीषिकाओं के बीच और उनके गुज़र जाने के बाद भी उसने जीवन के बीज बोए। इसके लिये उसे कभी किसी अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता नहीं रही। यह और बात है कि न जाने कब से पिलाई जाती रही त्याग, ममता और श्रद्धा की घुट्टियों ने उसके अस्तित्व को इस कदर बांधा कि वह आज तक इन्हीं छवियों में मुक्ति तलाशती आ रही है।

बहुत मुमकिन है आपने इस किताब में आने वाली औरतों में से अनेक के नाम न सुने हों। जीवन की भयानक त्रासदियों से गुज़रकर वे टूटीं, गिरीं और फिर उठकर खड़ी हुईं। ज़रूरी नहीं कि उन्हें किसी के सामने ख़ुद को किसी तरह साबित ही करना था लेकिन उन्होंने ज़िंदगी चुनी। उनमें से एक-एक हमारे ही भीतर लुक-छुपकर बैठी है, हमारे-आपके आसपास की औरत है। इस औरत ने बड़े एहतियात से तमाम शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक संघर्षों के बीच अपनी राह बनाई है। अशोक पाण्डे इसी औरत का हाथ थाम लेते हैं। —स्मिता कर्नाटक

29 नवंबर 1966 को उत्तरकाशी में जन्म। पैतृक गाँव उत्तराखंड के अल्मोड़ा ज़िले का ग्राम हल्दुवा। स्कूली शिक्षा बिड़ला विद्यामंदिर, नैनिताल से। ‘देखता हूँ सपने’ शीर्षक से कविता-संग्रह 1992 में छपा। विश्व साहित्य से कविता, उपन्यास और गद्य के अनुवादों की क़रीब दो दर्जन पुस्तकें, एक कथा-संग्रह ‘बब्बन कार्बोनेट’ और महिला-विमर्श पर आधारित पुस्तक ‘तारीख़ में औरत’ प्रकाशित। लातीन अमेरिका और यूरोप के अलावा सुदूर हिमालयी इलाक़ों की सीमांत घाटियों की अनेक लंबी यात्राएँ। इनमें से कुछ के विवरण पुस्तकों की सूरत में छपे हैं जिनमें ‘थ्रोन ऑफ़ द गॉड्स’, ‘अनडॉन्टेड स्ट्राइड्स’ और ‘द सॉन्ग सुप्रीम’ प्रमुख हैं। तिब्बत की कविता पर विशेष कार्य। यात्रावृत्तों के अलावा सिनेमा, खेल, हिमालय, चित्रकला और संगीत जैसे विषयों पर लेखन पिछले तीस सालों से अख़बारों-पत्रिकाओं में छपता रहा है। चर्चित ब्लॉग ‘कबाड़ख़ाना’ और उत्तराखंड की संस्कृति पर आधारित पहली वेबसाइट ‘काफल ट्री’ के संस्थापक-संपादक। हल्द्वानी में रहते हैं। लपूझन्ना पहला उपन्यास।