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Jadugarni जादूगरनी
(3 customer review)

189 (-5%)

Age Recommendation: Above 16 Years
ISBN: 978-93-92829-33-8 SKU: SV2020 Category:

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3 reviews for Jadugarni | जादूगरनी-सुरेन्द्र मोहन पाठक

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    राम सागर

    पुस्तक जादूगरनी
    लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक
    विधा जासूसी अपराध-गल्प उपन्यास
    प्रकाशन-इतिहास 1▪︎अप्रैल 1983, शनु पेपरबैक्स दिल्ली
    मूल्य 7 रुपये

    2▪︎फरवरी 1987, डायमंड पॉकेट बुक्स
    मूल्य 10 रुपये

    3▪︎अगस्त 1998, रजत प्रकाशन मेरठ
    मूल्य 25 रुपये

    4▪︎मई 2022, साहित्य विमर्श गुरुग्राम
    मूल्य 199 रुपये

    पृष्ठ 288 ( कुल )

    8 ( 1 से 8 तक परिचय, प्राक्कथन आदि )

    264 ( 9 से 272 तक उपन्यास-कथानक )

    12 ( 273 से 284 तक सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के
    सभी उपन्यासों की सूची )

    2 ( 285-286, साहित्य विमर्श से प्रकाशित
    सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के
    उपन्यासों का संक्षिप्त विवरण)

    1 ( 287 , साहित्य विमर्श प्रकाशन से प्रकाशित
    समस्त पुस्तकों की सूची )

    1 ( 288, साहित्य विमर्श प्रकाशन की विशेषताएँ
    तथा उपलब्ध सुविधाएँ )

    उपन्यास के आवरण को पलटते ही इतना तो समझ आ ही जाता है कि साहित्य विमर्श प्रकाशन ने बड़े शौक से और बड़ी महत्त्वाकांक्षा से इस उपन्यास का प्रकाशन किया है। विश्व के प्रसिद्ध जासूसी तथा थ्रिलर उपन्यासकारों का संक्षिप्त विवरण, लेखक के सभी उपन्यासों की सूची आदि भी उक्त कथन की पुष्टि करते हैं।

    आमतौर पर समीक्षाओं में मूल्य ज्यादा होने की बात लिखता रहा हूँ। पर इस उपन्यास की पृष्ठ संख्या तथा कागज की गुणवत्ता देखते हुए कहना ही पड़ेगा कि प्रकाशक ने कम से कम मूल्य रखने की पूरी कोशिश की है। नहीं तो अक्सर देखा है कि अपेक्षाकृत कम गुणवत्ता का कागज और 150 के आस-पास पृष्ठ स॔ख्या होते हुए भी आजकल पुस्तक का मूल्य 150 रुपये से 225 रुपये के मध्य होता है। जबकि “जादूगरनी” उपन्यास में 288 अर्थात्‌ लगभग दोगुने पृष्ठ हैं और कागज़ भी अपेक्षाकृत अच्छा ही है फिर भी मूल्य 199 रुपये रखा गया है। उससे भी कमाल की बात यह कि उपन्यास समाप्त होने पर तुरन्त यह ख्याल आता है कि इतना जबरदस्त उपन्यास है कि इसका मूल्य 300 रुपये भी होता तो भी पाठक को रत्ती भर भी मलाल न होता।

    आवरण का चित्र अच्छा है पर आवरण के चित्रकार से और बेहतर कला-कौशल की आकांक्षा उत्पन्न हुई। मतलब कि चित्र और सुन्दर बनाया जाना चाहिए था। आवरण की पृष्ठभूमि काले रंग की इसलिए किया गया है कि काले जादू का एहसास हो। मुख-आवरण तो फिर भी ठीक है पर पिछले आवरण का काला रंग लिखे हुए को पढ़ने में थोड़ा असहज लगता है।

    अगर इस “जादूगरनी” उपन्यास के बारे में एक शब्द में कहना पड़े तो ग़ज़ब, धाँसू, जबरदस्त में से कौन-सा शब्द सबसे उचित होगा ….. नहीं पता। शायद तीनों शब्द मिलाकर भी कम ही पड़ेगा अभिव्यक्त करने के लिए। लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक जी ने साबित किया है कि उनके उपन्यास ऐसे ही नहीं जासूसी अपराध-उपन्यास के पाठकों में तहलका मचा देते हैं। वे कथानक का ताना-बाना बुनते हुए अपराध के सुराग से सुराग की कड़ी जोड़ते हुए अचानक कत्ल की वारदात से सनसनी फैला देते हैं, साथ ही सुराग की कड़ी का सिरा ही गायब हो जाता है, अचानक ही धारणा की बत्ती गुल हो जाती है, पाठक अभी उस स्तब्धता से उबरने की सोच ही रहा होता है कि दूसरा ही कत्ल हो जाता है। इस तरह रहस्य कम होने की बजाय गहराता ही चला जाता है। घटनाओं, सुरागों और जानकारियों के निरन्तर रहस्योद्घाटन होते हुए उपन्यास के पात्र अचानक कत्ल हो रहते हैं और बचे हुए सभी पात्र संदिग्ध नज़र आने लगते हैं पर मुश्किल ये कि किसी भी षड्यन्त्र या कत्ल के पीछे सबका हाथ तो हो नहीं सकता, अपराधी तो उनमें से 1 या 2 ही हो सकते हैं ” पर कौन ” …. की माथा-पच्ची में पन्ने दर पन्ने आगे बढ़ते जाते हैं।

    इस उपन्यास में एक नयी बात ये देखी कि अधिकतर जासूसी उपन्यासों में अन्तिम 1-2 पृष्ठों में रहस्य का जबरदस्त भांडाफोड़ होता है। इस उपन्यास में कत्ल पर कत्ल तो होते रहते हैं और अक्सर रहस्य गहराते जाते हैं तो कहीं रहस्य के अंधेरे छँटते भी लगते हैं पर सबसे बड़े भेद का बम एक बार नहीं बल्कि 3-4 बार फूटता है। पहला बड़ा रहस्योद्घाटन होता है पृष्ठ 231 पर, फिर 237 पर और 265 पर।
    हाँ, अन्तिम 2-3 पृष्ठ में विशेष रहस्योद्घाटन की उम्मीद न करें।

    ❤️ ” जादूगरनी ” उपन्यास की एक झलक पृष्ठ 101 से

    ” उस वक्त वह एक घिसी हुई जींस और चैक की सूती कमीज पहने थी। कमीज कालर वाली थी और उसके बटन सामने की तरफ बन्द होते थे। कमीज के निचले सिरों को पकड़कर उसने उन्हें आपस में बाॅंध दिया था जिसकी वजह से सुनील को उसकी नाभि तक उसका नंगा पेट दिखाई दे रहा था। कमीज शायद उसे नाप में छोटी थी या शायद वैसी तंग कमीज पहनना फैशन में शुमार था, क्योंकि उसके हर बन्द बटन पर उसके उन्नत उरोजों का ऐसा खिंचाव पड़ रहा था कि हर दो बटनों के बीच एक आयताकार झरोखा पैदा हो गया था। उन झरोखों पर एक निगाह पड़ते ही सुनील समझ गया था कि वह नीचे ब्रेसियर नहीं पहने थी, उससे बेहतर यह बात कौन जानता हो सकता था कि उसके यौवन की उन्मुक्त उठान को ब्रेसियर जैसे नकली सहारे की जरूरत नहीं थी। वह जरा भी अपने कंधे को पीछे खींचती थी तो सुनील का कलेजा मुॅंह को आने लगता था और उसे यूॅं लगता था कि अभी सारे बटन पटाक-पटाक कर के टूट जायेंगे।
    लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
    वह जानती थी कि ऐसा होने वाला नहीं था इसीलिए शायद वह ऐसी खतरनाक कमीज पहने थी। ” 💕

    ऐसा नहीं है कि इस उपन्यास में कुछ अखरा नहीं। लेखक ने शायद पाठन-प्रवाह द्रुत रखने के उद्देश्य से या बारम्बारता की नीरसता से बचने के लिए संवादों के साथ बहुत जगह यह स्पष्ट ही नहीं किया कि किस संवाद को कौन कह रहा है। जिसके कारण थोड़ा रुक कर पहले वाले 8-10 संवाद पढ़ना पड़ता है, तब पल्ले पड़ता है। या फिर याददाश्त अच्छी हो, तर्कशक्ति अच्छी हो। मुझे तो संवादों में ये अड़चन आयी, अन्य के बारे में नहीं कह सकता कि उन्हें ऐसी अड़चन आयी या नहीं।

    सबसे बड़ी कमी मुझे प्रूफ-रीडिंग की लगी। त्रुटियाँ इतनी हैं कि बाकायदा त्रुटियों का वर्गीकरण किया जा सकता है। जैसे कि एक ही पृष्ठ पर किसी शब्द का दो तरह से लिखा होना, बिन्दुओं-चन्द्रबिन्दुओं की त्रटियाँ, मात्राओं की अशुद्धियाँ, अंग्रेजी के शब्दों का सही उच्चारण के अनुसार न लिखा होना, कही-कहीं आवश्यक संयोजक का प्रयोग न होना, कहीं कोई शब्द छूट जाना आदि-आदि।

    अंग्रेजी के बहुत से शब्द ऐसे होते हैं जिन्हें देवनागरी लिपि में शुद्ध लिख पाना सम्भव भी नहीं जैसे कि Bell शब्द को बेल लिखें तो भी ग़लत है और बैल लिखें तो भी, इसी तरह Dead को डेड या डैड … चाहे जैसा भी लिखें, सही नहीं लिख सकते। ऐसा नहीं है कि सम्भव नहीं है पर वो प्रचलन में नहीं हैं । जैसे बॆल या डॆड सही प्रयोग है। इसी तरह उपन्यास में और भी बहुत से उदाहरण मिल जायेंगे, जैसे कि एग्जैक्टली भी लिखा मिलता है और ऐग्जैक्टली भी। अंग्रेजी के कुछ शब्द ऐसे भी होते हैं जिन्हें पढ़े-लिखे लोग सही बोलते हैं और अनपढ़ तथा कम पढ़े-लिखे नासमझी में अलग तरह से बोलते हैं। जैसे कि कॉलर और कालर ।
    इसी तरह हिन्दी भाषा के अधिकांश पाठक तथा लेखक भी उर्दू शब्दों के नुक़्तों की जानकारी न होने के कारण अक्सर ग़लत ही लिखते-बोलते हैं, जैसे कि वक़्त और वक्त।

    इसके अलावा लेखक ने कहीं-कहीं उर्दू के के ऐसे शब्द भी प्रयोग किये हैं जिनका मतलब बस अनुमान से ही काम चलाना पड़ता है। जैसे कि
    154 पृष्ठ पर 28वीं पंक्ति में ‘तवाजन’,
    195 पृष्ठ पर 18वीं पंक्ति में ‘जिंसी’,
    227 पृष्ठ पर 19 वीं पंक्ति में ‘वाहिद’,
    262 पृष्ठ पर 8वीं पंक्ति में ‘इबरत’ आदि।

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    Sam

    Maine haal men hi Surender Pathak kee kitaben padhni shuru kee hain. Jadoogarni ko padhne ke liye bhi mangwaya. Ek behtareen rachna lagi Lekhak kee. Reporter sunil kumar kee shaandar chhaanbeen aur anupama ke bichhaaye jaal ne is upanyaas ko yaadgaar bana diya hai. Must read for everyone’s.

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    Abhishek Singh Rajawat (सहपाठी)

    बहुत ही शानदार किताब……..

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Jadugarni – वो कुछ भी कर सकती थी। वो किसी को तोता बनाकर पिंजरे में बंद कर सकती थी, मक्खी बनाकर दीवार से चिपका सकती थी ।वो जादूगरनी थी। एक अविस्मरणीय किरदार की अविस्मरणीय कहानी। सुनील सीरीज का एक सनसनीखेज उपन्यास।

Book Details

Weight 230 g
Dimensions 14 × 2 × 21 cm
Pages:   280

अनुपम सौन्दर्य की मालकिन अनुपमा। जब इस अनुपम सौन्दर्य की जुगलबंदी उसके खतरनाक दिमाग से हुई तो जैसे कहर बरपा हो गया। क्या कोई उसके जादू से बच पाया?

सुरेन्द्र मोहन पाठक का जन्म 19 फरवरी, 1940 को पंजाब के खेमकरण में हुआ था। विज्ञान में स्नातकोत्तर उपा‌धि हासिल करने के बाद उन्होंने भारतीय दूरभाष उद्योग में नौकरी कर ली। युवावस्‍था तक कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय लेखकों को पढ़ने के साथ उन्होंने मारियो पूजो और जेम्स हेडली चेज़ के उपन्यासों का अनुवाद शुरू किया। इसके बाद मौलिक लेखन करने लगे। सन 1959 में, आपकी अपनी कृति, प्रथम कहानी “57 साल पुराना आदमी” मनोहर कहानियां नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई। आपका पहला उपन्यास “पुराने गुनाह नए गुनाहगार”, सन 1963 में “नीलम जासूस” नामक पत्रिका में छपा था। सुरेन्द्र मोहन पाठक के प्रसिद्ध उपन्यास असफल अभियान और खाली वार थे, जिन्होंने पाठक जी को प्रसिद्धि के सबसे ऊंचे शिखर पर पहुंचा दिया। इसके पश्‍चात उन्होंने अभी तक पीछे मुड़ कर नहीं देखा। उनका पैंसठ लाख की डकैती नामक उपन्यास अंग्रेज़ी में भी छपा और उसकी लाखों प्रतियाँ बिकने की ख़बर चर्चा में रही। उनकी अब तक 306 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनका नवीनतम उपन्यास विमल सिरीज़ का ‘गैंग ऑफ फोर’ है। जादूगरनी उनका सुनील सीरीज का बहुचर्चित उपन्यास है। उन पर अन्य जानकारी के लिये www.smpathak.com पर विजिट करें। उनसे smpmysterywriter@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है। पत्राचार के लिये उनका पता है : पोस्ट बॉक्स नम्बर 9426, दिल्ली – 110051.