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गर्दिश में हूँ
प्रकाशक: Blue Emerald प्रकाशन
(2 customer review)

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Age Recommendation: Above 12 Years
ISBN: 978-8195604340 SKU: BE2307 Category:

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anurag.eib

समीक्षा किताब की उपन्यास : गर्दिश में हूं लेखक : आयुष वेदांत प्रकाशक : blue emrald पेज : 178 एक दिन मैंने इसी सोशल मीडिया पर लिखा था की आयुष वेदांत की आने वाली किताब का बेसब्री से इंतजार है क्योंकि कि किताब के टाइटल " गर्दिश में हूं " से एक आकर्षण जैसा लगा । उसी दिन एक मैसेज आया की आप आयुष वेदांत को जानते भी हो जो उसकी किताब पढ़ना चाहते हो। मैंने कहा नहीं जानता हूं और सच में इस किताब से पहले मैंने उनका नाम भी नहीं सुना था । उस व्यक्ति का जवाब था किताब पढ़ने से पहले आयुष वेदांत को गूगल कर लीजिएगा। मैंने भी बात खत्म करके तुरंत ही गूगल किया और गूगल करने के बाद तो मुझे यह किताब पढ़ने की और ज्यादा जल्दी महसूस होने लगी। अब आते हैं किताब पर तो किताब कल दोपहर को मुझे मिली और आज दोपहर तक में मैंने इसे पूरी पढ़ ली । कहानी पहले पेज से ही जबरदस्त स्पीड पकड़ लेती है। किताब के पहले पेज पर लिखा है " इस किताब के सभी पात्र, स्थान और घटनाएं काल्पनिक हैं " , किताब पढ़कर ऐसा लगता है यह सिर्फ एक फॉर्मेलिटी सेंटेंस ही है । कहानी बिल्कुल जीवंत और वास्तविक मालूम पढ़ती है। कहानी शुरू होती है कुछ अति उत्साही दोस्तों द्वारा फेसबुक पर ग्रुप बनाकर किसी भी मुद्दे पर पक्ष और विपक्ष में अपनी बात रखने से जिसे अब आज की भाषा में किसी के सपोर्ट या किसी के विरोध में ट्रोल करना कहा जाता हैं। इसी ट्रोलिंग सिस्टम में रहने वाला लड़का धनुज मिश्रा एक दिन अपने ही ग्रुप के लोगों से लड़ने के चक्कर में जेल चला जाता है । दोस्तों के बीच होने वाले इस सोशल मीडिया के हसी मजाक में जब बात आगे बढ़ जाती है और उसमें जब साथ की ही कोई लड़की अपने ईगो के चक्कर में धनुज मिश्रा को जेल भिजवा देती है । कहानी दिल्ली में रहने वाले दोस्तों और रांची के जेल में बंद धनुज मिश्रा को लेकर साथ साथ चलती है। जेल के भीतर की कहानी भी इस उपन्यास के माध्यम से दिखाई पड़ती है। सरकारी सिस्टम और सरकारी चूड़ियों की कहानी लेखन में लगातार फ्लो बनाए रखती है । धनुज मिश्रा की जेल की कहानी आपको " क्रिमिनल जस्टिस वाले विक्रांत मेसी और जैकी श्राफ की याद दिलाती है । कहानी अंत में ऐसे मोड़ पर छोड़ी गई है जिसे पढ़कर लगता है कि इसका अगला भाग भी आ सकता है । इस किताब पर लिखने के लिए बहुत कुछ है लेकिन इससे कहानी का सस्पेंस खुल जाएगा इसलिए किताब खरीदिए और पढ़िए ... यकीन मानिए पैसा वसूल किताब है और किताब के पहले पन्ने पर ही एक नाम दिखा ( एक्टिविस्ट और लेखिका : ज्योति तिवारी ) का जिससे मुझे तो शुरुआत में ही लगा था कि किताब दमदार होने वाली है और किताब के अंत में यह कहानी मेरी उम्मीद से बढ़कर निकली। एक वाक्य में कहें तो " मजा आ गया " । किताब अमेजन , फ्लिपकार्ट और साहित्य विमर्श पर भी उपलब्ध है। जरूर पढ़ें । धन्यवाद। - अनुराग वत्सल ( नई वाली हिन्दी )

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pkpandey723

बहुत उम्दा 👌 ऑनलाइन दुनिया ही अजीब है। अपने आस-पड़ोस, गाँव, देहात, रिश्तेदारी, दोस्ती यारी, चौक, मोहल्ले या फिर संसार के किसी भी कोने में किसी भी प्रकार के आदमी से अगर आपकी तू-तू मैं-मैं हुई हो, तो हो सकता है कि किसी खास मौके पर या वेमौके ही आपकी सुलह हो जाए, लेकिन ऑनलाइन दुनिया में सुलह एक असंभव सा वाक्य है। यहाँ की दोस्ती की कोई गारंटी नहीं लेकिन यहाँ की दुश्मनी एकदम मजबूत और गाढ़ी होती है, साल गुजर जाते लेकिन दुश्मनी जस के तस रहती है। समय-समय पर आप कोई पोस्ट करके, या किसी पोस्ट का स्क्रीनशॉट लगाकर और कुछ नहीं तो किसी और के पोस्ट पर अपने दुश्मन के ऊपर कोई विशेष टिप्पणी देकर इस दुश्मनी की आग में घी डालने का काम करते हैं। #गर्दिश_में_हूँ.... Ayush Vedant

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    anurag.eib

    समीक्षा किताब की
    उपन्यास : गर्दिश में हूं
    लेखक : आयुष वेदांत
    प्रकाशक : blue emrald
    पेज : 178

    एक दिन मैंने इसी सोशल मीडिया पर लिखा था की आयुष वेदांत की आने वाली किताब का बेसब्री से इंतजार है क्योंकि कि किताब के टाइटल ” गर्दिश में हूं ” से एक आकर्षण जैसा लगा । उसी दिन एक मैसेज आया की आप आयुष वेदांत को जानते भी हो जो उसकी किताब पढ़ना चाहते हो। मैंने कहा नहीं जानता हूं और सच में इस किताब से पहले मैंने उनका नाम भी नहीं सुना था । उस व्यक्ति का जवाब था किताब पढ़ने से पहले आयुष वेदांत को गूगल कर लीजिएगा। मैंने भी बात खत्म करके तुरंत ही गूगल किया और गूगल करने के बाद तो मुझे यह किताब पढ़ने की और ज्यादा जल्दी महसूस होने लगी।
    अब आते हैं किताब पर तो किताब कल दोपहर को मुझे मिली और आज दोपहर तक में मैंने इसे पूरी पढ़ ली । कहानी पहले पेज से ही जबरदस्त स्पीड पकड़ लेती है। किताब के पहले पेज पर लिखा है ” इस किताब के सभी पात्र, स्थान और घटनाएं काल्पनिक हैं ” , किताब पढ़कर ऐसा लगता है यह सिर्फ एक फॉर्मेलिटी सेंटेंस ही है । कहानी बिल्कुल जीवंत और वास्तविक मालूम पढ़ती है। कहानी शुरू होती है कुछ अति उत्साही दोस्तों द्वारा फेसबुक पर ग्रुप बनाकर किसी भी मुद्दे पर पक्ष और विपक्ष में अपनी बात रखने से जिसे अब आज की भाषा में किसी के सपोर्ट या किसी के विरोध में ट्रोल करना कहा जाता हैं। इसी ट्रोलिंग सिस्टम में रहने वाला लड़का धनुज मिश्रा एक दिन अपने ही ग्रुप के लोगों से लड़ने के चक्कर में जेल चला जाता है । दोस्तों के बीच होने वाले इस सोशल मीडिया के हसी मजाक में जब बात आगे बढ़ जाती है और उसमें जब साथ की ही कोई लड़की अपने ईगो के चक्कर में धनुज मिश्रा को जेल भिजवा देती है । कहानी दिल्ली में रहने वाले दोस्तों और रांची के जेल में बंद धनुज मिश्रा को लेकर साथ साथ चलती है। जेल के भीतर की कहानी भी इस उपन्यास के माध्यम से दिखाई पड़ती है। सरकारी सिस्टम और सरकारी चूड़ियों की कहानी लेखन में लगातार फ्लो बनाए रखती है । धनुज मिश्रा की जेल की कहानी आपको ” क्रिमिनल जस्टिस वाले विक्रांत मेसी और जैकी श्राफ की याद दिलाती है । कहानी अंत में ऐसे मोड़ पर छोड़ी गई है जिसे पढ़कर लगता है कि इसका अगला भाग भी आ सकता है ।
    इस किताब पर लिखने के लिए बहुत कुछ है लेकिन इससे कहानी का सस्पेंस खुल जाएगा इसलिए किताब खरीदिए और पढ़िए … यकीन मानिए पैसा वसूल किताब है और किताब के पहले पन्ने पर ही एक नाम दिखा ( एक्टिविस्ट और लेखिका : ज्योति तिवारी ) का जिससे मुझे तो शुरुआत में ही लगा था कि किताब दमदार होने वाली है और किताब के अंत में यह कहानी मेरी उम्मीद से बढ़कर निकली। एक वाक्य में कहें तो ” मजा आ गया ” । किताब अमेजन , फ्लिपकार्ट और साहित्य विमर्श पर भी उपलब्ध है। जरूर पढ़ें । धन्यवाद।

    – अनुराग वत्सल
    ( नई वाली हिन्दी )

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    pkpandey723 (सहपाठी)

    बहुत उम्दा 👌

    ऑनलाइन दुनिया ही अजीब है। अपने आस-पड़ोस, गाँव, देहात, रिश्तेदारी, दोस्ती यारी, चौक, मोहल्ले या फिर संसार के किसी भी कोने में किसी भी प्रकार के आदमी से अगर आपकी तू-तू मैं-मैं हुई हो, तो हो सकता है कि किसी खास मौके पर या वेमौके ही आपकी सुलह हो जाए, लेकिन ऑनलाइन दुनिया में सुलह एक असंभव सा वाक्य है। यहाँ की दोस्ती की कोई गारंटी नहीं लेकिन यहाँ की दुश्मनी एकदम मजबूत और गाढ़ी होती है, साल गुजर जाते लेकिन दुश्मनी जस के तस रहती है। समय-समय पर आप कोई पोस्ट करके, या किसी पोस्ट का स्क्रीनशॉट लगाकर और कुछ नहीं तो किसी और के पोस्ट पर अपने दुश्मन के ऊपर कोई विशेष टिप्पणी देकर इस दुश्मनी की आग में घी डालने का काम करते हैं।

    #गर्दिश_में_हूँ….
    Ayush Vedant

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गर्दिश में हूँ – इस पुस्तक का उद्देश्य काल्पनिक पात्रों और कहानियों के माध्यम से इस युवा लेखक द्वारा यह बताना है कि हम बच्चों के लड़कपन और आपराधिक नियत में विभक्तिकरण करना शुरू करें। कभी-कभी हम समाज में कुछ ऐसा होते देखते हैं जो हम जानते हैं गलत है, मगर चुपचाप उसपर आखें मूँद लेते हैं। मगर एक लेखक से ऐसा नहीं हो पाता, वो उस पर आखें नहीं मूँद पाता और कहानी पिरो देता है। यहाँ युवा लेखक आयुष वेदांत ने एक ऐसी ही सच्चाई कहानी के रूप में कही है, जिसको कहने में अक्सर लोग घबराते हैं।

अपराध और अपराधी बनने ,बनाने में समाज का बहुत बड़ा योगदान होता है। इस पुस्तक मे विभिन्न काल्पनिक चरित्र और घटनाओं के माध्यम से दिखाया गया है कि कैसे एक साधारण लड़के को अपराधी बनाया जा सकता है। “लड़का है तो किया ही होगा” के सिद्धांत पर चलने वाला समाज कैसे एक आरोप पर लड़के को कठघरे में खड़ा कर देता है, इसका आत्मकथात्मक शैली में लेखक ने वर्णन किया है। इस पुस्तक को पढ़ कर आप अपने दिल के करीब पाएंगे क्योंकि यह वो कहानी है जो देखी सुनी सभी ने पर कहा कुछ नहीं।

 

Book Details

Weight 240 g
Dimensions 13 × 2 × 20 cm
Pages:   178

इस पुस्तक का उद्देश्य काल्पनिक पात्रों और कहानियों के माध्यम से इस युवा लेखक द्वारा यह बताना है कि हम बच्चों के लड़कपन और आपराधिक नियत में विभक्तिकरण करना शुरू करें। कभी-कभी हम समाज में कुछ ऐसा होते देखते हैं जो हम जानते हैं गलत है, मगर चुपचाप उसपर आखें मूँद लेते हैं। मगर एक लेखक से ऐसा नहीं हो पाता, वो उस पर आखें नहीं मूँद पाता और कहानी पिरो देता है