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दुमछल्ला
प्रकाशक: सन्मति प्रकाशन
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ISBN: 978-9390539369 SKU: SM1928 Category:

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    anurag.eib

    समीक्षा किताब की

    उपन्यास : दुमछल्ला
    लेखक : निशांत जैन
    प्रकाशक : सन्मति पब्लिकेशन
    पेज : 160

    नेगेटिव पब्लिसिटी भी असर करती है; इस बात पर मेरा विश्वास कम था इस किताब को पढ़ने से पहले । कल किसी अनजाने मित्र से निशांत जी की ही दूसरी किताब ” शोर ” पर बात हो रही थी तो उन्होंने कहा की उनको ” दूमछल्ला ” का रिव्यू लोगों से अच्छा नहीं मिला इसलिए वो ” शोर ” अभी नहीं पढ़ना चाहते हैं। बात खत्म होने के बाद ध्यान आया की दूमछल्ला मेरे पास भी एक महीने पहले ही आ गई है लेकिन अभी तक पढ़ी नहीं गई है , तो उस मित्र से बात करने के बार दूमछल्ला उठा ली।
    आज कल हाई लाइटर लेकर पढ़ना शुरू किया तो इस किताब की भूमिका में ही पहली बार रंगने का मौका मिल गया । पंक्ति है –
    ” रिश्ते को बेहतर बनाने की कोशिश में समय के साथ हम इतने उलझ चुके होते हैं कि सामने वाले की भावनाएं, अपेक्षाएं या उसका सम्मान भूल जाते हैं।”
    बस फिर तो पहले पन्ने से ही किक मिल गई इस किताब को पढ़ने के लिए और सिर्फ 4 घंटे में किताब पूरी पढ़ ली । ये मेरी पहली ऐसी उपन्यास है जिसके लिए सुबह 5 बजे जग गया कहानी पढ़ने के लिए। जिंदगी को जीने का जो तरीका इसमें निर्मय के किरदार का है वो same मेरा भी रहा है । कम से कम शुरू के 100 पेज तक का । बहुत कुछ लिखने का मन है इस उपन्यास के ऊपर लेकिन जब लिख रहा हूं तो शब्द कम पड़ रहे हैं। कई बार ऐसा होता है जब हम छोटे थे और हमारे गांव में सर्कस वाला आता था तब हम लोग बड़े उत्साह के साथ सर्कस देखने जाते और उन कलाकारों के कारनामे पर शुरू से ही खूब तालियां बजाते फिर धीरे धीरे हम शांत हो जाते और सर्कस चालू रहता था लेकिन कोई ताली नहीं बजाता । सब देखने में मशगूल हो जाते और जब सर्कस खत्म होता तब अपने स्थान पर खड़े होकर जोर जोर से तालियां बजाते , सीटियां बजाते। ” दूमछल्ला ” पढ़ते हुए ऐसा ही हो गया 100 पेज तक तो हर पेज को पंक्तियां मिलती रही जो अंडर लाइन करने वाली थी । जिंदगी से जुड़ी हुई इतनी सारी पंक्तियां इससे पहले अब तक किसी उपन्यास में नहीं पढ़ी। 100 पेज के बाद सर्कस वाला हाल हो गया 160 पेज की कहानी खत्म हुई । कहानी खत्म होने के बाद याद आया की अंडर लाइन करना तो रह गया । कुछ पंक्तियां खूब पसंद आई जैसे –

    1. दिमाग शरीर का सबसे आलसी हिस्सा होता है, काम करना ही नहीं चाहता ।

    2. सवालों के जबाव जानने की उत्सुकता कभी कभी रिश्तों को और बिगाड़ देती है।

    3. किसी भी इंसान को अपनी जिंदगी में इतनी अहमियत मत दो कि जिंदगी उसके इशारे पर चलने लगे ।

    4. दुनियां का सबसे खूबसूरत एहसास होता है बिना मतलब कुछ बोले किसी को अपनी बाहों में भर लेना ।

    5 . सारे अनुभव पहली नज़र में अच्छे ही लगते हैं। जिंदगी परिणामों पर निर्भर करती है ।

    2009 में नोएडा सेक्टर 15 के एक ऑफिस में गया था वहां शेयर मार्केट से संबंधित काम होता था । वो सब लोग उस काली काली स्क्रीन में क्या देख रहे थे ये जानने की इच्छा तब से थी जो इस उपन्यास को पढ़ते हुए आज पूरी हुई। शेयर मार्केट , जिंदगी दोस्त परिवार और प्यार से जुड़ी इस किताब को जरूर पढ़िएगा । निशांत जैन जी की दोनो किताब ” दूमछल्ला ” और ” शोर ” दोनों ही अच्छी लगी । किताब amazon , flipkart , दिनकर पुस्तकालय और साहित्य आरुषि पर उपलब्ध है । जरूर पढ़ें।

    – नई वाली हिन्दी

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दुमछल्ला कहानी है आधुनिक समाज में रिश्तों के तनाव और आजादी की आकांक्षा के बीच द्वन्द्व की। 6 लोग, जिंदगियाँ ऐसी उलझ गयी हैं कि सुलझाना आसान नहीं है।

Book Details

Weight 195 g
Dimensions 13.34 × 0.97 × 20.32 cm
Pages:   162

जब इंसान अंदर से टूटता है तो वो अपनी बात समझाने के तरीके ढूँढने लगता है । और जब अंदर भावनाओं का ज्वार उठ रहा हो और सुनने वाला कोई न हो, तो वो खुद के लिए फैसलें लेता है । बेशक वो समाज की मान्यताओं में सही न हो लेकिन वो फिर भी अपने हक़ में फैसलें लेता है । यह कहानी है जागी आँखों से देखें जाने वाले सपनों की, उन अहसासों की, जिन्हें हम जीना चाहते हैं लेकिन जी नहीं पाते । उन अहसासों की जो जन्म तो लेते हैं लेकिन कुछ समय बाद सिकुड़ जातें हैं । दुमछल्ला कहानी है भावनाओं से भरे 6 लोगों की, जिनमें प्यार, विश्वास, अपनापन तो है लेकिन एक-दूसरे को आज़ादी देने की हिम्मत नहीं है । किसी की एक गलती उन सभी की जिंदगी को उस मोड़ तक ले जाती है, जहाँ से कुछ भी ठीक कर पाना न नहीं था । दखल किसने, किसकी जिंदगी में दिया था, कह पाना मुश्किल है । नादानी, नासमझी या अपरिपक्वता, चाहे जो भी नाम दें लेकिन सवाल तो बस आज़ादी से ही जुड़ा था ।

आधे चार्टर्ड अकाउंटेंट और कभी पूरे स्टॉक ब्रोकर रहे निशान्त, आप सब की ही तरह, परिवार और रिश्तों तो अहमियत देते हैं लेकिन व्यक्तिगत आज़ादी भी इनके लिए उतनी ही महत्वपूर्ण है । इनसे बात करना आपको सुकून देता है लेकिन इनके विचार आपको भीतर तक परेशान कर सकते हैं, झकझोर सकते हैं । इन्हें शुरु से ही पढ़ने का काफी शौक है और कुछ-कुछ लिखते भी रहते हैं । इनकी लिखी कहानी “बायोलॉजिकल मदर” उनकी चर्चित कहानिओं में शुमार है । 2017 में एक बीमारी के बाद इन्होनें अपने पारिवारिक प्रकाशन में दिलचस्पी लेनी शुरु की और कम समय में ही उसे एक मुकाम पर स्थापित करने की दिशा में तेज़ी से अग्रसर हैं । जब भी इन्हें फुर्सत मिलती है तो शोर-शराबे से दूर, प्रकृति की एकांत गोद में खुद को महफूज़ रख लेते हैं ।.