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दिल की खिड़की में टँगा तुर्की (turkey)
(9 customer review)

179 (-10%)

ISBN: 978-81-953625-6-1 SKU: SV1094 Category:

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9 reviews for दिल की खिड़की में टँगा तुर्की

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    Parag Dimri (सहपाठी)

    दिल की खिड़की में टंगा तुर्की ” लेखिका रुपाली नागर संझा की तृतीय रचना है। पहली “आन लाइन डेटिंग” ये इसलिए भी ज्यादा भायी कि विषय की परिकल्पना, नायाब, अनूठी , अभी तक भूतो न भविष्यति की कलगी शान से,अकड़ कर धारण किए हुए है। नया सा, मौलिक भी क्या होता है, इसे किसी को समझाने के लिए, अक्सर इस पुस्तक को उदघृत करना पड़ जाता है। आन लाइन डेटिंग- दो पात्रों के आभासी संसार पर चल रही बातचीत पर केंद्रित लेखन। दोनों किरदारों के बीच क्या रिश्ता है, किस पड़ाव पर है- ये सब कल्पनाएं, विश्लेषण, विवेचना पढ़ने वालों ने ही करनी है। दूसरी “इस पार मैं” जीवन के विभिन्न दौर में लिखी गई कविता़ओं का गुच्छा, जो अलग अलग अंदाज , रिश्तों, पसंदो को बयां करती है। ..।।।। तीसरी.।।…. “दिल की खिड़की में टंगा तुर्की” को यदि यात्रा वृतांत ही कहकर संबोधित ता प्रचारित किया जाए, एक भारी अन्याय होगा, यह पुस्तक और रचनाकार दोनों के साथ। पहला प्रमाण यह ही देती है कि जोन लेखन के दायरे में कैद होने से लेखिका बची हुई हैं बहुत निराला गुण है ये👍, रचनाकारों के विशिष्ट गुण हमेशा उनके साथ जुड़ाव नहीं रखते, वक्त के साथ धुंधले पड़ने लगते हैं। इन लेखिका के साथ ऐसा कुछ दृषटिगोचर न हो, .ऐसी कुछ प्रार्थना भी🙏! इस किताब पर पहले भी लिख चुका हूँ, सर्वप्रथम इसको किंडल में पढ़ा था तब, उसे उस दौरान लिखा गया था! इस बार इसे पुश्तैनी रुप में पढ़ने से गुजरा हूँ। नवनीतम अध्ययन के अनुभव , पहले से कुछ अलग से भी हैं, कुछ कारण हैं इसके पीछे- इसलिए भी कि थोड़ा वक्त भी गुजर चला है , हमारी भी समझदारी, बेवकूफी में वृद्धि /कमी, हो गई हो। अब चूंकि लेखिका भी “पाप की नगरी” की निवासी बन चुकी है , तो उनसे कुछ मुलाकातें भी इस अदने के द्वारा की जा चुकी हैं। कुछ अपने भीतर लोगों को पढ़ने ,बूझने का शौक है, तो कुछ उन रुबरु मुलाकात के परिणामस्वरूप, रचनाकार की, जेहन में एक छवि भी दर्ज हो गई , इस बार वाले पढ़नें में/ लिखे को, समझने में, उस दर्ज छवि की दखलंदाजी भी होती रही। पुस्तक में लेखिका विभिन्न रुपों में आच्छादित है, पत्नी, मां , स्वयं और सबसे उपर रचनाकार, जो लिखने के दौरान इन तीनों पर हावी सा ही रहता है। ऐसा वो क्यों करता रहा? वो गुजरे वक्त का हिसाब- किताब भी करना चाहता है, (जहां वो गुमशुदा सा रहा) । आशंकित भी है कि भविष्य में , फिर से उसे नैपथ्य में धकेल दिया जाना है, रचनाकार ने सबकी डोर अपने हाथों में ही थामें रखी है, वो बहुत उत्साहित है, इस यात्रा के अनुभवों को अपने ही अंदाज में बयां करने के लिए। इसलिए इन लेखनी वाले लम्हों में ही उसे संपूर्ण , उफान के साथ जी लेना है, गुजर चुके की क्षतिपूर्ति के लिए, और भविष्य को अग्रिम में ,इस वर्तमान में ही जी लेने के लिए। इस प्राप्ति के लिए चाहे उसे, विशाल, विकराल स्वरूप को ही साकार क्यों न करना पड़े ,.इसके लिए कोई गिला शिकवा भी उसके भीतर नहीं। …इन क्षणों को जीते हुए ही उसे, इक पूरी उम्र जो चुरानी है… रचना में तुर्की के विभिन्न स्थल भी किरदार के रुप में हैं, जिनके गौरव, दर्द, खुशियां अफसोस पाठकों. को. भिगोते रहते हैं। मुझे यूं भी यकीन सा होने लगता है कि जिस शख्सियत से कुछ मुलाकातें कर चुका हूँ, पुस्तक में दृषटिगत हो रहा रचनाकार ही, उसकी मौलिक, वास्तविक व्यक्तित्व को उजागर कर रहा है🤨😐!!! सामान्य तौर पर इस पुस्तक का रचनाकार , सामान्य तौर पर जैसा दिखाई पड़ता है, वैसा दृषटिगोचर होने के पीछे, क्या कारक होगे?? जवाब कुछ ऐसा ही कि जिंदगी जीने में कई लिबास, अंकुश, मुखौटे धारण, लगाने पड़ते हैं, यहां भी शायद कुछ ऐसा ही 🤔🤔 तुर्की एक प्राचीन देश है, यहां की प्राचीनता बहुत कुछ समेटे है। पती,पुत्र के साथ भ्रमण पर पहुंची के लिए ये भ्रमण नहीं रह जाता, कई भावनाओं का स्पंदन, कुछ व्यक्तित्वों का जन्म उसके भीतर होने लगता है, यूं भी इसे समझिए कि कुछ आंशिक लघु ज्वालामुखी जैसे उसके भीतर फूट पड़े हों। परिणति स्वरूप, उसे कभी षोडशी, कभी संजीदा ,कभी इतिहासकार जैसे रुपों के मध्य भ्रमण भी करना पड़ा । ये सब छलकता भी रहता है , दिलचस्प अंदाज में, पुस्तक में घुमक्कड़ी के विवरणों को परोसने के दौरान। साहित्यिक छौंक भी घुलमिली है, किंतु उबाउपन बोझिलता से दूरी रखकर। ये सब, इसे यात्रा का वर्णन जैसै के दर्जे के नामकरण से बहुत दूर धकेले रहता है। तुर्की देश को, साहित्यिक संजय की आंखों से पढ़ कर,देखना है, और बीच बीच में रोचक अंदाजे बयां की शीतल, निर्मल बौछारों के साथ, जो पाठकों की अनुभूतियों को मचलने, थिरकने को मजबूर करती है। “दिल की खिड़की में टंगा तुर्की” एक अच्छा सशक्त माध्यम, जरिया बन गया है। ….तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे मैं एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा न लगे… “संझा” तो यहां एक नहीं बल्किअनेक शामें ही नहीं, बल्कि कई सुबहें, दोपहरियां, रातें अच्छा पढ़ने वालों के लिए चुराकर ले आई हैं। साहित्य विमर्श का भी हिमालय के माफिक धन्यवाद, आभार, नवोदित प्रकाशन होते हुए भी, बाजार में स्वाभाविक रुप से बिकने वाले विषयों (जासूसी, कालेज लव स्टोरी ) पर ही ध्यान नहीं केंद्रित किए हुए हैं।

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    Sohel Raza

    टर्की घूमना है? और वो भी बिना पासपोर्ट और वीज़ा के तो रुपाली नागर ‘संझा’ जी के यात्रा संस्मरण “दिल की खिड़की में टँगा तुर्की” पढ़ने से बेहतर और कुछ नहीं हो सकता।

    अपने यात्रा संस्मरण में लेखिका ने टर्की के विभिन ऐतिहासिक शहरों (इस्ताम्बुल, कुसदासी, एफेसस, पॉमोकाले, उरगुप, कैपेदोकिया, बुरसा, ट्रॉय, कॉन्काले) के विभिन्न परिवेशों का रेखाचित्र अपनी जादुई भाषा से बखूबी खींचा है।

    यूँ तो तुर्की हमेशा से अपने भौगोलिक क्षेत्र की वजह से तमाम संस्कृतियों का संगम रहा और यहाँ कई सभ्यताएं फली और फूलीं। लेकिन इतिहास का जो कुछ भी शेष रहा वो इस देश के कोने-कोने में खूबसूरती से पटा पड़ा है।

    पहाड़-नदी-घाटी-सागर-जंगल-मैदान-रेत ये सब इतना खूबसूरत वर्णित है कि किताब को पढ़ते हुए आप खुद को उस जगह महसूस कर रोमांचित हो उठते हैं। पासाबैग वैली, इमेजिनेशन वैली, थ्री बीयूटीज़, लव वैली, ग्रीन मोसके, गोल्डन हॉर्न, हागिया सोफिया इत्यादि जैसे स्थलों की खूबसूरती के बीच मुझे सबसे ज़्यादा आकर्षित पिलर ऑफ क्राइंग पर होली आय ने किया।

    “हर शहर का अपना एक मिजाज़ होता है
    वो उसमें रहने वाले लोगों में साँसें लेता है।”

    लेखिका मशहूर हिप्पोड्रोम इलाके से गुजरती हुई शहरों के बीच में बने चौक ‘स्क्वायर’ को उन शहरों की रूह बताते हुए कहती हैं इनमें एक अलग किस्म का चुम्बकीय आकर्षण होता है और यही उन शहरों का एसेंस। लेखिका आगे कहती है कि इस इलाके के लोग जो अपने-अपने काम-धंधों में पूरी तन्मयता से लगे होते हैं, जिन्हें उनके हाव-भाव और मिजाज़ से समझा और पढा जा सकता है।

    रुपाली दी की भाषा जादुई है गद्य में काव्य सौंदर्य उत्पन्न करने की उनमें एक अनूठी कला है, जो उनकी सहज भाषा भी है। इस यात्रा संस्मरण में उनके शब्दों के इस्तेमाल से खूबसूरत देश किसी जन्नत से कम नहीं लगता। वहां का परिवेश, लोग, उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति, एवं इतिहास को समझने के लिए यह किताब आपको टर्की के खूबसूरत सफर पर ले जाने के लिए सबसे उपयुक्त होगी।

    तुर्की देश का आपका सफर सुखद एवं मंगलमय हो।
    ——-

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    AJAY Suryavanshi

    ❤️
    Dil ki khidaki main tanga Turkey.💕

    Crystal clear blue water, tall mountains, the ruins of ancient empires-Roman to Ottoman- small picturesque villages, huge cosmopolitan cities, there are so many compelling reasons now I’ve with myself to visit Turkey after reading this captivating book.

    Just like the eyes of Sanjay of Mahabharata who described the battle to Dhritarashtra ,Rupali through her beautiful eyes and words narrates her experience of Turkey.

    Rupali’s, admiration for Turkey had begun during her doctoral days when she was doing her research on it.

    Rupali has done remarkably well to establish a link between the human being and nature while aesthetically describing the beauty of the nature and treasure of human potential in her book.

    It is not just a mere fact ridden book or a travelogue that would have become monotonous in the age of Google.Instead, it encompasses Turkey’s geography, history, culture, cuisine, ethos of people.

    The reader will be glued to the book as they navigate various historical cities & towns of Turkey- Ephesus, Kusadasi, Pamukkale, Urgup, Cappadocia(her favorite town), Bursa, & Istanbul.Moreover, the book is also replete with various comparisons drawn between Indian and people of Turkey.especially in the way of living and their thought process.

    In every city she tries to convey some sort of message of it’s transient existence or the treasure of human capabilities.It has an edifying effect on the minds of readers.

    It is to her credit that with each passing chapters the reader gets involved more and more with cities of Turkey as one vicariously imagine themselves in that city and once one finishes reading the book, the seeds are already engendered for visiting this country and knowing more about its vast history and rich culture.

    With best wishes & awaiting for your new book.
    SURYAAJAY

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    Nupur Mandloi

    यह यात्रा वृतांत मैंने सिर्फ़ पढ़ा ही नही पढते हुए मैंने तुर्की को अपनी नज़र से देखा भी और घुमा भी।फिर चाहे वो अतीत में जा कर एफेसस का हार्बर रोड हो या अभी कुसादासी में रूफ टाॅप रेस्तरां हो।इतना सुन्दर चित्रण पढ़ कर मन बहुत प्रफुल्लित हो गया है ।लेखिका रूपाली नागर को दिल से बधाई ।अब तुर्की दिल की खिड़की में ही नहीं टंगा मेरे दिल में भी बस गया है ।

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    Vaishali Trivedi

    A great book especially the depth of narrating the places ,the essence of love for Turkey of Rupali reflects the things moreover with each destination.
    It takes us as we ourselves visiting the country. The Book will sure insist you to visit Turkey and feel all those Rupali ‘s Diwanapan for Turkey.
    A reflection of True love from Rupali to Turkey.There are a few person who can express the feeling in writing in such a fantastic manner that one can’t leave without reading the full creature.
    Absolutely Remarkable Rupali

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अपनी पहली साँस से लेकर अंतिम साँस तक यूँ तो हर कोई अपनी एक नियत जीवन यात्रा से गुजरता है। चाहे वो उतार-चढ़ाव वाली हो, घुमावदार हो या सीधी सपाट।

इस मायने में हर इंसान सैलानी ठहरा। लेकिन ताज्जुब ये कि अंतिम पड़ाव तक पहुँच जाने पर भी उनमें से अधिकतर ये जान नहीं पाते कि वो एक सुहाने सफ़र का हिस्सा थे। वे बस चलते चले जाते हैं, ऐसे जैसे चलता रहता है कोल्हू का बैल कोई।

इस चलने में तेल तो बनता रहता है, पता पर उनको चलता नहीं, ना ही उनकी देह के काम आ पाता है। दुनिया मगर इन जैसों के काँधों पर बैठ नहीं चलती। अपने धुर विगत इतिहास से लेकर अब तक, वो चलती-बढ़ती रही है उन खोजी-मनमौजी घुमंतु लोगों की बदौलत जो दूर-दूर तक ना जाने किस अनंत की तलाश में अथक रास्ते नापते रहे हैं।

हमारे पुरखों की उन यात्राओं से ही हमारी दुनिया का ये वर्तमान नक्शा उजागर हुआ है।

मेरी यह यात्रा भी उनके नक्शे-कदम पर चलकर उनकी यात्रा को एक कदम और आगे बढ़ाने की एक कोशिश थी। इस यात्रा वृत्तांत में दुनिया के इसी नक्शे पर ठीक दिल की जगह बसे देश तुर्की का बखान है। मैं उम्मीद करती हूँ ग्लोब का ये अनूठा दिल मेरे दिल की खिड़की में टँगकर विंडचाइम की मीठी ध्वनि की तरह आपका दिल लुभाएगा।

अपनी नादानी में कतिपय कारणों से मेरे दिल में ये गुबार उठता रहा कि अच्छा ना होता अगर किसी एक ही शहर में बसी रहती मैं?लेकिन उससे ज़्यादा बार ये सोचकर चिंहुक उठती हूँ कि अहा!कितना ही अच्छा हुआ, कि इस तरहा कई शहर आकर बस गए मुझमें। आधी सदी से ज़्यादा समय हुआ उन तमाम शहरों की एक घनी बस्ती बस गयी है मुझमें,जिसने मुझे इतना घनेरा कर दिया है कि उसकी छाँव तले आते-जाते लोग थोड़ा सुस्ता सकते हैं।अब इससे ज़्यादा की हसरत नहीं कि ये घनापन निरंतर बढ़ता रहे,लोगों को अपनी ओर खींचता रहे। मैं ख़ुद अपने बारे में क्या कहूँ? सिवाय इसके कि मेरे शब्दों ने अपनी झिझक छोड़ अभी कुलबुलाना शुरू ही किया है।मेरी इतनी सी गुज़ारिश है कि फ़िलहाल तो जो कहा है उसका लुत्फ़ उठाइये,जो अभी अनकहा है उसपे नाहक सवाल ना उठाइये।मेरे इस कहन के बूते ही मुझे जानिये।ये मेरी ज़िद है,ये ज़िद ही मेरा परिचय।