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छाप तिलक सब छीनी
(4 customer review)

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Age Recommendation: Above 14 Years
ISBN: 9788195217113 SKU: SV917 Category:

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4 reviews for छाप तिलक सब छीनी

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    anurag.eib

    समीक्षा किताब की

    छाप तिलक सब छीनी
    लेखक – सुनीता सिंह
    प्रकाशक – साहित्य विमर्श
    पेज – 123

    वैसे तो मुझे फिक्शन किताबें खूब पसंद है लेकिन जब से ” छाप तिलक सब छीनी ” ऑनलाइन में दिखनी शुरू हुई तब से इस किताब के टाइटल को देखकर ही पढ़ने का मन था। जब किताब हाथ में आई तो इसकी अनुक्रमणिका देखी ” वेलेंटाइन डे ” शीर्षक को देखकर सोचा की पहले ये पढ़कर देखते हैं । सिर्फ एक कहानी को पढ़ने के लिए उठाई इस किताब की मैंने एक के बाद एक करके 6 कहानी उसी वक्त एक साथ सिर्फ दो घंटे में पढ़ डाली। सही से याद नहीं की पिछली बार कब मैंने मोबाइल को छोड़कर 2 घंटे तक सिर्फ किताब पढ़ी थी ( शायद ” शोर ” पढ़ते हुए ऐसा हुआ था )।

    फिक्शन किताबों की तरह भागती कहानी के बीच में एक ऐसी किताब पढ़ी जिसमें ठहराव है। किताब की सब कहानी पढ़ते हुए ऐसा लगा कि ये तो हमारे ही परिवार की कहानी जैसी है । जिसमें बाबा हैं, दादी हैं, चाचा – चाची हैं और भी सब हमारे ही घर के लोग कहीं न कहीं इस किताब की अलग अलग कहानियों में घूम रहे हैं। जहां फिक्शन पढ़ते हुए लगता है कि फटाफट पेज पलटते जाएं वहीं इस किताब को पढ़ते हुए कई बार ऐसा हुआ कि किताब बीच – बीच में बंद करके कुछ सोचने लगते थे। अक्सर ऐसा लगा की लेखिका मेरी बुआ हैं जो अपने जीवन की घटनाओं और अनुभव की कहानी मुझे सुना रहीं हैं। नई वाली हिन्दी के दौर में शुद्ध हिन्दी के ऐसे ऐसे शब्द इस किताब में पढ़कर मुझे बाबा की खूब याद आई जो हमेशा शुद्ध हिंदी का ही प्रयोग करते थे। हमारी शुरुआती शिक्षा बिहार के ” सरस्वती शिशु मंदिर ” में हुई है इसलिए भी इतने सालों बाद जो शुद्ध हिंदी के शब्द तब पढ़े थे इस किताब में वापस पढ़कर सुखद अनुभव हुआ। एक से बढ़कर एक अंडर लाइन करने वाली पंक्तियाँ इस किताब में है जैसे –

    1. होता है … औरत कभी कभी सिर्फ प्रेम के सहारे भी रह लेती है।

    2. तकलीफ़ की घड़ी में इंसान के साथ खड़े हो जाओ न तो कई जिंदगियां संभल जाती हैं।

    3. सच्चा प्रेम याचक भी नहीं होता ।

    ऐसी कितनी ही बातें है ” छाप तिलक सब छीनी ” में जो आपको छू लेती है। ऐसी किताब आप जल्दी से पढ़कर खत्म करना नहीं चाहते । थोड़ा – थोड़ा रोज पढ़ते रहने का लालच जैसा लगता है। भागती दुनियां में ऐसी किताब को आपको रुकने पर बाध्य कर दे आसानी से सब तक नहीं पहुंच पाती । रिश्तों को समझने और अच्छी कहानी के लिए इसे जरूर पढ़िएगा।

    – नई वाली हिन्दी

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    Rishabh Rawat

    Worth buying.

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    R.S.Sahu

    सुंदर कहानियों से सजा एक अनमोल गुलदस्ता। कहानियाँ जो दिल में उतर जाए

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    राजीव (सहपाठी)

    पठनीय और संग्रहणीय कृति। हमारे आसपास बिखरे पात्रों के जीवन को लेखिका के ऊष्म स्पर्श ने अद्वितीय उजास से भर दिया। ये वो कहानियाँ हैं, जो हमारे भाव संसार को समृद्ध .. समृद्धतर करती हैं।

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छाप तिलक सब छीनी

कहानी ब्याहता के कुछ अंश
चुभती हुई गरमियों के दिन ..। नयन के माथे का घूँघट…उसके ललाट पर विषधर के फन सरीखा फैला हुआ था। पसीने से नहायी… हाथ का पंखा झलती ,वह घूँघट की ओट से आंगन की झकमक करती भीड़ को ताक रही थी। वहां शोरगुल के घने बादलों के बीच….रंगीन साड़ियों और दमकते गहनों से सजी गुजी औरतें, हलवाईयों की निगरानी करने में उलझे पुरुष,बिन माँगे सलाहों की पुष्पवृष्टि करतीं गांव घर की बुजुर्ग सुलझी हुई महिलाएं,शरारतों में रमी बालकों की टोली, टटके कस्बाई फैशन को कृतार्थ करती नवयुवतियाँ  ….मानों एक इंद्रधनुष सा फैला था।

मगर नयन को प्रतीत हो रहा था कि इस इंद्रधनुष से आग की लपटें निकल रही हैं और वह फुंकी जा रही है…इन लपटों में। उसका सारा शरीर तप रहा है। अचानक उसे लगने लगा कि उसके इर्द गिर्द… एक बहुत बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गई है।  उसे बहुत शिद्दत से एकांत की आवश्यकता महसूस होने लगी..चिर-काम्य,शीतल एकांत!

पर क्यों ऐसा हुआ ! कल दोपहर तक तो नयन…इस कदर तपिश से झुलसी न जा रही थी। वह अच्छी भली… मेहमानों के लिए भगौने भर भर कर चाय बना रही थी ,तरकारियाँ काटने में महराजिन की मदद कर रही थी ,समारोह की विशिष्ट अतिथिद्वय बूढ़ी फुआ सासों के पांव दबा कर आशीषें बटोर रही थी। और तो और…विवाह के पूर्व की कई रस्मों पर गाए जाने वाले चुटीले , “ए” प्रमाणपत्र वाले गीतों पर भी उदार मन से मुस्कुरा पड़ी थी। तो फिर…रंग में भंग कहां हुआ! स्वभाव! और क्या…!!!बचपन से ही ऐसी है वह। कोई बात कलेजे में बैठ गई तो फिर निकलने का नाम ही नहीं लेती। फिर दिनों तक…उलझी- उलझी, सख्त चेहरा लिए फिरती रहेगी। पर बात भी कैसी…! मन की जलन जाने का नाम ही नहीं ले रही। आँखें मूंदे… उंगलियों के पोरों से फटती कनपटियाँ दाबे…वह चुपचाप लेटी थी पर एक दिन पहले की दोपहर…जैसे सांकल बजा-बजा कर उसे उद्विग्न करती रही। कल दोपहर से औरतों का  गाना बजाना शुरू हुआ और फिर जैसी महफिल सजी कि बस ! मंझली ननद और उसकी सहेलियां जब ” कल रात हमरे घर में चोरी भयी…” पर थिरकीं तो नयन मोहाविष्ट सी देखती ही रह गई। ” कहाँ से सीखा! शहरों में तो कोरियोग्राफर सिखाते सिखाते अपना सिर पीट लेते हैं मगर पृथुल कटि…बल खाने से इंकार कर देती है। ” यहाँ तो डर लग रहा था कि सौ सौ बल खाती कमर कहीं मोच न खा जाए।  दो-दो बहुएँ उतार चुकी…घूँघट काढ़े, सुंदरी अनरसा भाभी ने जब ” सैंया थानेदार हमारे नथुनिए पे गोली मारे…” गाते हुए ..नाचना शुरू किया तो इतने जोरों का कहकहा लगा कि नयन भौंचक्की रह गई। गांव की ही एक ननद ने कान में बताया  कि इनके पति सचमुच में थानेदार हैं। मुस्काती नयन ने सामने दृष्टि गड़ा दी। किसी नौटंकी की बाई सी मंजी अदा से …वह क्षीण कटि..जानलेवा ठुमके लगा रही थी। कमरा…सस्ते मजाकों और ठहाकों से गूँज रहा था।तभी शोर सा उठा” कानपुर से आ गईं…”। और किसी सुवासित हवा के झोंके सी…वह सलोनी स्त्री..औरतों से भरे उस कमरे में जब आकर खड़ी हुई तो लगा कि…कमरा अचानक दूधिया बल्ब की रौशनी में नहा उठा। काली तांत की साड़ी पर कढ़े बेलबूटे…फिरोजी रंग का पूरी आस्तीनों वाला ब्लाउज, कानों में सोने के मोरों से जटित झुमके और वैसे ही कंगन। विराट कत्थई बिंदिया से सजा…उन्नत माथा।

संपर्क:
लेखक : https://www.facebook.com/authorsunitasingh
sunita.singh@sahityavimarsh.com
प्रकाशक: संपर्क करें

Book Details

Weight .130 g
Dimensions 20 × 2 × 14 cm
Total Pages

123

Pages:   

वह कहानियाँ…
जो स्त्री-मन की अंधेरी गलियों से हो कर गुजरीं, जीवन की आपाधापी में गुम होते-होते रह गईं और मानवीय प्रेम और करूणा के उजालों की तलाश में सतत विचरती रहीं। मानव-मन अपने अनगढ़ स्वरुप में कितना लुभावना हो सकता है, कितना करुणामय…. इस किताब की कहानियों के किरदार, यही छटा बिखेरते हैं। ख़ास कर स्त्री पात्र। पीड़ा में भी अलौकिक सौन्दर्य है। इन कहानियों के आत्मा, इसी सौन्दर्य से गर्वोन्नत है।

मूलतः पटना, बिहार से हैं। जन्म, शिक्षा-दीक्षा…वहीं हुई। 1996 में विवाह के उपरांत, क्रमशः पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, (संप्रति)मध्यप्रदेश में निवासरत रहीं। इस क्रम में ढेरों यात्राएँ कीं, नये नये लोग मिले। उनकी बोली-बानी, लोकगीतों, खान-पान, रहन-सहन से परिचय हुआ। अनुभवों की शाख से पत्ते झरते रहे जीवन की राहों पर। यही अनुभव कहानियों की आधार शिला बने।
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