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By सुनीता सिंह
M.R.P.: 140 (Sale Price)
Format: Paperback, Kindle
Age Recommendation: Above 14 Years
(1 customer review)

Frequently Bought Together

  • वह कहानियाँ… जो स्त्री-मन की अंधेरी गलियों से हो कर गुजरीं, जीवन की आपाधापी में गुम होते-होते रह गईं और मानवीय प्रेम और करूणा के उजालों की तलाश में सतत विचरती रहीं। मानव-मन अपने अनगढ़ स्वरुप में कितना लुभावना हो सकता है, कितना करुणामय…. इस किताब की कहानियों के किरदार, यही छटा बिखेरते हैं। ख़ास कर स्त्री पात्र। पीड़ा में भी अलौकिक सौन्दर्य है। इन कहानियों के आत्मा, इसी सौन्दर्य से गर्वोन्नत है।

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छाप तिलक सब छीनी

कहानी ब्याहता के कुछ अंश
चुभती हुई गरमियों के दिन ..। नयन के माथे का घूँघट…उसके ललाट पर विषधर के फन सरीखा फैला हुआ था। पसीने से नहायी… हाथ का पंखा झलती ,वह घूँघट की ओट से आंगन की झकमक करती भीड़ को ताक रही थी। वहां शोरगुल के घने बादलों के बीच….रंगीन साड़ियों और दमकते गहनों से सजी गुजी औरतें, हलवाईयों की निगरानी करने में उलझे पुरुष,बिन माँगे सलाहों की पुष्पवृष्टि करतीं गांव घर की बुजुर्ग सुलझी हुई महिलाएं,शरारतों में रमी बालकों की टोली, टटके कस्बाई फैशन को कृतार्थ करती नवयुवतियाँ  ….मानों एक इंद्रधनुष सा फैला था।

मगर नयन को प्रतीत हो रहा था कि इस इंद्रधनुष से आग की लपटें निकल रही हैं और वह फुंकी जा रही है…इन लपटों में। उसका सारा शरीर तप रहा है। अचानक उसे लगने लगा कि उसके इर्द गिर्द… एक बहुत बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गई है।  उसे बहुत शिद्दत से एकांत की आवश्यकता महसूस होने लगी..चिर-काम्य,शीतल एकांत!

पर क्यों ऐसा हुआ ! कल दोपहर तक तो नयन…इस कदर तपिश से झुलसी न जा रही थी। वह अच्छी भली… मेहमानों के लिए भगौने भर भर कर चाय बना रही थी ,तरकारियाँ काटने में महराजिन की मदद कर रही थी ,समारोह की विशिष्ट अतिथिद्वय बूढ़ी फुआ सासों के पांव दबा कर आशीषें बटोर रही थी। और तो और…विवाह के पूर्व की कई रस्मों पर गाए जाने वाले चुटीले , “ए” प्रमाणपत्र वाले गीतों पर भी उदार मन से मुस्कुरा पड़ी थी। तो फिर…रंग में भंग कहां हुआ! स्वभाव! और क्या…!!!बचपन से ही ऐसी है वह। कोई बात कलेजे में बैठ गई तो फिर निकलने का नाम ही नहीं लेती। फिर दिनों तक…उलझी- उलझी, सख्त चेहरा लिए फिरती रहेगी। पर बात भी कैसी…! मन की जलन जाने का नाम ही नहीं ले रही। आँखें मूंदे… उंगलियों के पोरों से फटती कनपटियाँ दाबे…वह चुपचाप लेटी थी पर एक दिन पहले की दोपहर…जैसे सांकल बजा-बजा कर उसे उद्विग्न करती रही। कल दोपहर से औरतों का  गाना बजाना शुरू हुआ और फिर जैसी महफिल सजी कि बस ! मंझली ननद और उसकी सहेलियां जब ” कल रात हमरे घर में चोरी भयी…” पर थिरकीं तो नयन मोहाविष्ट सी देखती ही रह गई। ” कहाँ से सीखा! शहरों में तो कोरियोग्राफर सिखाते सिखाते अपना सिर पीट लेते हैं मगर पृथुल कटि…बल खाने से इंकार कर देती है। ” यहाँ तो डर लग रहा था कि सौ सौ बल खाती कमर कहीं मोच न खा जाए।  दो-दो बहुएँ उतार चुकी…घूँघट काढ़े, सुंदरी अनरसा भाभी ने जब ” सैंया थानेदार हमारे नथुनिए पे गोली मारे…” गाते हुए ..नाचना शुरू किया तो इतने जोरों का कहकहा लगा कि नयन भौंचक्की रह गई। गांव की ही एक ननद ने कान में बताया  कि इनके पति सचमुच में थानेदार हैं। मुस्काती नयन ने सामने दृष्टि गड़ा दी। किसी नौटंकी की बाई सी मंजी अदा से …वह क्षीण कटि..जानलेवा ठुमके लगा रही थी। कमरा…सस्ते मजाकों और ठहाकों से गूँज रहा था।तभी शोर सा उठा” कानपुर से आ गईं…”। और किसी सुवासित हवा के झोंके सी…वह सलोनी स्त्री..औरतों से भरे उस कमरे में जब आकर खड़ी हुई तो लगा कि…कमरा अचानक दूधिया बल्ब की रौशनी में नहा उठा। काली तांत की साड़ी पर कढ़े बेलबूटे…फिरोजी रंग का पूरी आस्तीनों वाला ब्लाउज, कानों में सोने के मोरों से जटित झुमके और वैसे ही कंगन। विराट कत्थई बिंदिया से सजा…उन्नत माथा।

संपर्क:
लेखक : https://www.facebook.com/authorsunitasingh
[email protected]
प्रकाशक: संपर्क करें

 

Book Details

Weight .130 g
Dimensions 20 × 2 × 14 cm
Total Pages

123

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5 out of 5 stars

1 review

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