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चाँद का पहाड़ chander pahar
(3 customer review)

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ISBN: 978-93-92829-04-8 SKU: SV947 Category:

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3 reviews for चाँद का पहाड़

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    anurag.eib

    Bahut hi sundar

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    Abhishek Singh Rajawat (सहपाठी)

    अनुवादों के साथ अमूमन समस्या ये रहती है कि कहानी का ट्रांसलेशन तो हो जाता है परंतु उसका भाव पकड़ के उसे वैसा उकेर पाना बहुत मुश्किल होता है, जयदीप जी ने मामले में इतना अच्छा काम किया है कि अनुवाद न होकर उनका खुद की रचना नजर आती है पुस्तक…

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    सिद्धार्थ अरोड़ा ‘सहर’ (store manager)

    कहानी 1906-07 में रहते नौजवान लड़के शंकर की है। शंकर पढ़ाई पूरी कर चुका है लेकिन छोटी-मोटी नौकरी लेबरी नहीं करना चाहता। वो दुनिया देखना चाहता है, वो पहाड़ों पर जाना चाहता है, वो अपनी ज़िंदगी में एक से बढ़कर एक एडवेंचर करना चाहता है।
    उसकी किस्मत फिर ऐसी पलटती है कि छोटे से कारखाने में नौकरी करने की बजाए उसे अफ्रीका की रेलवे लाइन में काम करने का मौका मिल जाता है।
    यहाँ उसे पता चलता है कि एक man-eater शेर है जो एक-एक कर उसके साथी कुलियों को अपना शिकार बना रहा है।
    फिर कुछ ऐसा मौका आता है कि शंकर का सामना अफ्रीका के सबसे खतरनाक ‘ब्लैक माम्बा’ साँप से होता है।
    आधी किताब के बाद कहानी बिल्कुल पलट जाती है और शंकर एक पुर्तगाली एक्सप्लोरर एलवारेज के साथ शंकर हीरे की खोज में निकल पड़ता है। अफ्रीका के इन घने से घने जंगलों में कबीले हैं, लगातार होती बारिश है, बीमार कर देने वाला झरना है, खतरनाक जानवर हैं और दाढ़ी वाली मादा बंदरियाँ भी हैं।
    लेकिन इन्हीं के बीच एक और जीव है जिसे कभी किसी ने साक्षात नहीं देखा, हाँ उसकी आवाज़ सुनी है, उसके पदचाप सुने हैं और सुनी है उन लोगों की आखिरी चीखें जो उसके सामने पड़ने का दुस्साहस कर बैठे थे।
    वो है बुनिप! बुनिप पहाड़ की जिन ऊँचाइयों पर रहता है, वहाँ कोई दूसरा जानवर भी नहीं आता! बुनिप को एक गुफा का पहरेदार कहा जाता है…! अलवारेज़ भी जानता है कि बुनिप अगर सामने पड़ जाए तो क्या हश्र हो सकता है!
    हर पल चौंकाती, रोमांच जगाती ये कहानी आपको बिना आखिरी पन्ना पढे चैन नहीं लेने देती। मन का बच्चा उस एक्सप्लोरर के साथ पहाड़ियाँ कूदने लगता है।
    मज़े की बात ये भी है कि कहीं से भी चाँद का पहाड़ अनुवाद नहीं जान पड़ता, जयदीप शेखर जी ने ऐसी भाषा शैली इस्तेमाल की है कि सवा सौ साल पुरानी कहानी भी कल परसों की घटना ही लगती है। जो क्लिष्ट शब्द हैं उनके साधारण भाषा में मतलब भी हाशिये पर लिखे गए हैं।
    अच्छी बात ये भी है कि चाँद का पहाड़ में बहुत ज़्यादा कैरिक्टर्स नहीं हैं, शंकर और अलवारेज़ के अलावा दो-चार ही आते-जाते टेम्परेरी पात्र हैं। बुनिप का भोकाल इतना भयंकर बनाया है कि जंगल में शंकर से ज़्यादा डर पढ़ने वाले को लगता है।
    यह किताब 12 साल के लड़के से लेकर 70 साल तक के बुज़ुर्ग के लिए भी must read श्रेणी में रखी जा सकती है

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चाँद का पहाड़ बांग्ला उपन्यास चाँदेर पाहार (Chander Pahar) का जयदीप शेखर द्वारा किया गया हिंदी अनुवाद है। मूल उपन्यास के रचनाकार हैं बिभूति भूषण बंद्योपाध्याय। चाँद का पहाड़ कहानी है अफ्रीका में एक भारतीय किशोर के साहसिक कारनामों की। चाँद का पहाड़ 1937 की मूल रचना है, जब अफ्रीका को अंध महादेश कहा जाता था। चाँद का पहाड़ का न सिर्फ कई भाषाओं में अनुवाद हुआ है, बल्कि विभिन्न भाषाओं में इस पर फिल्मों का निर्माण भी हुआ है।

चाँद का पहाड़ गाथा है 1909 के एक भारतीय किशोर शंकर रायचौधरी की, जो साहसिक जीवन जीना चाहता था। संयोगवश वह जा पहुँचता है अफ्रीका, जिसे उन दिनों ‘अन्ध महादेश’ कहा जाता था, यानि जिसके अधिकांश हिस्सों तक मनुष्य के चरण अभी नहीं पहुँचे थे!

वहाँ संयोगवश ही उसकी मुलाकात पुर्तगाली स्वर्णान्वेषी दियेगो अलवरेज से हो जाती है। दोनों मध्य अफ्रीका की दुर्लंघ्य रिख्टर्सवेल्ड पर्वतश्रेणी में स्थित पीले हीरे की खान की खोज में निकल पड़ते हैं, जिसके बारे में मान्यता थी कि एक भयानक दैत्य ‘बुनिप’ उसकी रक्षा करता है!

कैसा रहा यह अभियान? क़्या वे सफल हो सके?

महान बांग्ला लेखक बिभूतिभूषण बन्द्योपाध्याय की रहस्य-रोमांच से भरपूर अमर रचना ‘चाँदेर पाहार’ (1937) का हिन्दी अनुवाद है चाँद का पहाड़, जिसे कि बाल-किशोरों के लिए ‘अवश्य पढ़ें’ की श्रेणी में रखा जा सकता है।

जन्म- 24 अक्तूबर, 1894 ई., घोषपाड़ा-मुरतीपुर गाँव, अब नदिया जिला, प. बँगाल देहावसान- 1 नवम्बर, 1950 ई., घाटशिला, अब झारखण्ड पुरस्कार- रवीन्द्र पुरस्कार (मरणोपरान्त), 1951 सहधर्मिणी- गौरी देवी (जिनका देहान्त कॉलेरा से हो गया था) और रमा चट्टोपाध्याय शुरुआती जीवन विभूतिभूषण वन्द्योपाध्याय का जन्म उनके ननिहाल में हुआ था और उनका बचपन बैरकपुर में बीता, जहाँ उनके परदादा बशीरहाट से आकर बस गये थे। उनके पिता महानन्द वन्द्योपाध्याय संस्कृत के विद्वान थे और पेशे से कथावाचक थे। उनकी माता मृणालिनी देवी थीं। पाँच भाई-बहनों में विभूतिभूषण सबसे बड़े थे। एक मेधावी छात्र के रुप में उन्होंने बनगाँव हाई स्कूल से एण्ट्रेन्स एवं इण्टर की पढ़ाई की; सुरेन्द्रनाथ कॉलेज (तत्कालीन रिपन कॉलेज) से स्नातक बने, मगर कोलकाता विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की पढ़ाई वे अर्थाभाव के कारण पूरी नहीं कर पाये और जंगीपाड़ा (हुगली) में वे शिक्षण के पेशे से जुड़ गये। आजीविका एवं परिवार की जिम्मेवारी निभाने के लिए वे और भी कई पेशों से जुड़े रहे। लेखन- विभूतिभूषण वन्द्योपाध्याय के रचना-संसार की पृष्ठभूमि बँगाल का ग्राम्य-जीवन रहा है, वहीं से उन्होंने सारे पात्र लिये हैं। उन दिनों ‘प्रवासी’ बँगाल की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका हुआ करती थी, जिसमें उनकी पहली कहानी ‘उपेक्षिता’ सन् 1921 ईस्वी में प्रकाशित हुई। 1925 में भागलपुर (बिहार) में कार्यरत रहने के दौरान उन्होंने ‘पथेर पाँचाली’ लिखना शुरु किया, जो 1928 में पूरा हुआ। उसी वर्ष यह रचना ‘प्रवासी’ में धारावाहिक रुप से प्रकाशित हुई और उन्हें प्रसिद्धि मिलनी शुरु हो गयी। अगले साल यह रचना पुस्तक के रुप में प्रकाशित हुई। आज बँगला साहित्य में शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय के बाद उन्हीं का स्थान माना जाता है। रचना-संसार- विभूतिभूषण वन्द्योपाध्याय की कुछ अन्य रचनायें: अपराजिता (1931), मेघमल्हार (1931), मयुरीफूल (1932), यात्राबादल (1934), चाँदेर पाहाड़ (चाँद का पहाड़) (1937), किन्नरदल (1938), अरण्यक (1939), आदर्श हिन्दू होटल (1940), मरणेर डंका बाजे (1940), स्मृतिर रेखा (1941), देवयान (1944), हीरा-माणिक ज्वले (1946), उत्कर्ण (1946), हे अरण्य कथा कह (1948), इच्छामति (1950), अशनि संकेत , विपिनेर संसार, पथ चेये, दुई बाड़ी, अनुवर्तन, आह्वान, तृणांकुर, दृष्टि प्रदीप, मिसमिदेर कवच, अभियात्रिक, इत्यादि। सत्यजीत राय ने वर्ष 1955 में ‘पथेर पाँचाली’ (रास्ते का गीत) पर विश्वप्रसिद्ध फिल्म बनायी थी। बाद में ‘अपराजिता’ और ‘अपुर संसार’ (अपु का संसार) फिल्में बनाकर उन्होंने "अपु त्रयी" (Apu Trilogy) को सफलतापूर्वक पूरा किया। पटकथा लेखन के विद्यार्थियों से सत्यजीत राय ने निम्न कथन लेखक विभूतिभूषण वन्द्योपाध्याय की प्रशंसा में कहे थेः "उनकी पंक्तियाँ चरित्र पर इस तरह सटीक बैठती हैं कि भले ही उन्होंने किसी चरित्र का चरित्र-चित्रण न कर रखा हो; फिर भी, चरित्र द्वारा कही गयी बातों से उसका एक सजीव रुप उभर कर सामने आ जाता है।"