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कैलेंडर पर लटकी तारीखें-calendar par latki tareekhen
(11 customer review)

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Age Recommendation: Above 16 Years
ISBN: 978-81-953625-5-4 SKU: SV1098 Category:

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11 reviews for कैलेंडर पर लटकी तारीखें

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    anurag.eib

    समीक्षा किताब की

    किताब – कैलेंडर पर लटकी तारीखें
    लेखक – दिव्या शर्मा
    प्रकाशक – साहित्य विमर्श
    पेज – 176
    मूल्य – 199/-

    मई २०२२ से यह किताब हमारे पास है | कश्मीर जब घुमने गए तब भी यह किताब हमारे साथ थी उस समय ही इसकी कुछ कहानियां पढ़ी थी | किताब का कवर डिजाईन इतना अच्छा लगा की तब हमारे पास मौजूद किताबों में सबसे ज्यादा इसी की फोटोग्राफी करी थी हमने | वापस आने के बाद और भी दुसरे कामों और किताबों की वजह से “ कैलेंडर पर लटकी तारीखें “ कहीं पीछे रह गयी थी | कल सुबह अचानक से यह किताब फिर से निकाली और मुड़े हुए पन्ने से आगे पढ़ना शुरू किया तो अगले कुछ ही घंटे में 100 पन्ना पढ़ गया | कुछ कहानियां तो इतनी प्यारी हैं इसमें कि उसको पूरा करने के बाद तुरंत दुबारा पढने का मन किया | लघुकथा के रूप में यह किताब है जिसमे 88 छोटी छोटी कहानियां है | वैसे तो यह किताब लघु कथा की है लेकिन इसमें मौजूद छोटी छोटी कहानियों का भाव बड़ी कहानियों जैसा है। बहुत सी कहानी ऐसी है जो पढ़ते हुए सीधा उतरती जाती है। कई बार पढ़ते हुए लगा की इतनी कम शब्दावली में बहुत ही गहराई वाली बात लिख दी है दिव्या शर्मा जी ने | एक कप चाय या कॉफ़ी पीते पीते आप इस लघुकथा संग्रह की तीन से चार कहानी आराम से पढ़ सकते हैं | किताब की कुछ पंक्तियाँ जो मुझे अच्छी लगी |
    1. खामोश किस्सों के पास एक नाव होती है, जिसकी पतवार अनदेखे , अनसुने किरदारों के हाथ में होती है |
    2. हर व्यक्ति यहाँ रोज नए किरदार निभाता है |
    3. आंधी तबाही मचा कर ही जाती है , लेकिन हर आंधी के बाद आसमान साफ हो जाता है |
    4. शादी जिन्दगी को उलझाने के लिए नहीं बल्कि उलझन को सुलझाने के लिए होती है |

    इस किताब को पढ़कर कुछ लिखने का मन तो बहुत पहले से था लेकिन कल एक पोस्ट देखी जो राजीव रोशन जी ने शेयर की थी | वह पोस्ट किताब पढ़कर उसपर लोगों के प्रतिक्रिया देने के विषय पर ही थी तो मुझे उस पोस्ट को पढ़कर लगा की अब तो जरुर कुछ न कुछ लिखना चाहिए | अंत में यही कहना चाहूँगा की किताब तो पढ़कर अच्छी लगी ही साथ में किताब पर लिखकर और भी अच्छा लग रहा है | आप सब भी हिंदी की कोई भी किताब पढ़ते हैं तो पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया जरुर लिखें | आपको भी अच्छा लगेगा और “ कैलेंडर पर लटकी तारीखें “ जरुर पढ़ें | किताब amazon और साहित्य विमर्श के website पर भी उपलब्ध है | धन्यवाद |
    – अनुराग वत्सल
    ( नई वाली हिंदी )

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    Abhishek Singh Rajawat (सहपाठी)

    जैसे 90s के दौरान एक सिरियल के हर एपिसोड के अंत में नायक एक लाइन कहता है, ‘ छोटी-छोटी मगर मोटी बातें ‘ वैसे ही इस कहानी संग्रह की हर कहानी में एक सीख छुपी हुयी है|

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    Ayushi

    Heart touching stories.

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    Girish Kumar

    बहुत सुंदर कहानियां
    जीवन के हर पहलू से जुड़ी कहानियां

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    krishna kumar maurya (सहपाठी)

    दीदी हमेशा यथार्थ लिखती है। आप एक एक कथाओं को पढ़ते समय अपने अंदर एक अलग परिवर्तन महसूस करेंगे।

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कैलेंडर पर लटकी तारीखें – दिव्या शर्मा (Calendar Par Latki Tareekhen- Divya Sharma)

हर तारीख की अपनी एक कथा है।

जो लिखी गई हैं यथार्थ के धरातल पर कल्पनाओं के रंगों को समेट कर। यह रंग हमारे अपने हैं जिनमें शामिल है हमारी पूरी ज़िन्दगी।

जिन्दगी जो समंदर की तरह होती है, वह समंदर दिल की गहरी गुफा में बह रहा है लेकिन
“इस नमकीन… समंदर में भी ज्वार-भाटा आते हैं…. तब उस अंधेरी गुफा में ….भी …शोर मचने लगता है ..।”

इसी ज़िन्दगी के उतार चढावों को, इसके सुख और दुःख के रंगों को समेटकर लाया है यह लघुकथा संग्रह जो कहीं-न-कहीं आपको अपने होने का एहसास दिलाएगा।

 

दिव्या शर्मा जी ने लेखन-कर्म का आरम्भ जून २०१७ से किया एवं वर्तमान समय तक आपने १५० से अधिक लघुकथाओं की रचना की हैं, जो भिन्न-भिन्न पत्र-पत्रिकाओं एवं प्लेटफार्मस पर प्रकाशित हो चुकी हैं. कैलेंडर पर लटकी तारीखें उनकी चुनिंदा लघुकथाओं का संग्रह है। आपके द्वारा लिखित कई लघुकथाओं का नाट्य मंचन ‘नुक्कड़ नाट्य मंडली’ एवं संस्थाओं द्वारा किया गया है. कैंसर पर जागरूक करती लघुकथा "मर्कट_कर्कट" का रूपांतरण नशाखोर के रूप प्रयागराज के प्रतिष्ठित रंगशालाओं में मंचन। आपको अपनी रचनाओं के लिए भिन्न-भिन्न संस्थानों द्वारा पुरस्कार एवं सम्मान से सम्मानित किया गया है. वर्तमान में, आप विश्व भाषा अकादमी, हरियाणा की महासचिव के पद पर आसीन हैं एवं साथ ही ‘युग-युगांतर’ पत्रिका की सह-संपादक भी हैं.