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Behaya
प्रकाशक: हिन्द युग्म प्रकाशन
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Age Recommendation: Above 15 Years
ISBN: 978-9387464988 SKU: HY2476 Category:

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    anurag.eib

    पहले पन्ने से जुड़ती चली जाती है कहानी

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Behaya – हमारे देश में शादी और प्यार पर फिल्मों की बड़ी छाप है। लेकिन असल ज़िन्दगी सुनहरे परदे की कहानियों से बहुत अलग होती है।

कई बार राम-रावण अलग-अलग नहीं होते बल्कि वक़्त और हालात के साथ एक ही व्यक्ति किरदार बदलता रहता है।

‘Behaya’ कहानी है सिया और यश की कामयाब और खूबसूरत ज़िन्दगी की। यह कहानी है रूढ़िवादी सोच से उपजे शक़ और बंधनों की। यह कहानी है उत्पीड़न और डर के साये में जीने वाले मुस्कुराते और कामयाब चेहरों की।

यह कहानी है समाज के सामने सशक्त दिखने वालों की मजबूरी और उदारता का जामा ओढ़े हैवानों की भी।

बार-बार कहने पर, देखने पर भी जो बातें जीवनसाथी नहीं समझ पाते; कैसे वही दर्द और टीस एक अनजान व्यक्ति बस आवाज़ सुनकर समझ जाता है? कैसे मुस्कुराते चेहरे के पीछे की उदासी को वह पल भर में भाँप लेता है?

आत्माओं के कनेक्शन से उपजे कुछ खूबसूरत रिश्ते समाज के बंधनों से परे होते हैं। ‘बेहया’ कहानी है सिया और अभिज्ञान के इसी अनकहे, अनजान और अनगढ़े रिश्ते की।

Book Details

Weight 200 g
Dimensions 14 × .5 × 20 cm
Pages:   132

Behaya – हमारे देश में शादी और प्यार पर फिल्मों की बड़ी छाप है। लेकिन असल ज़िन्दगी सुनहरे परदे की कहानियों से बहुत अलग होती है।

कई बार राम-रावण अलग-अलग नहीं होते बल्कि वक़्त और हालात के साथ एक ही व्यक्ति किरदार बदलता रहता है।

‘Behaya’ कहानी है सिया और यश की कामयाब और खूबसूरत ज़िन्दगी की। यह कहानी है रूढ़िवादी सोच से उपजे शक़ और बंधनों की। यह कहानी है उत्पीड़न और डर के साये में जीने वाले मुस्कुराते और कामयाब चेहरों की।

यह कहानी है समाज के सामने सशक्त दिखने वालों की मजबूरी और उदारता का जामा ओढ़े हैवानों की भी।

बार-बार कहने पर, देखने पर भी जो बातें जीवनसाथी नहीं समझ पाते; कैसे वही दर्द और टीस एक अनजान व्यक्ति बस आवाज़ सुनकर समझ जाता है? कैसे मुस्कुराते चेहरे के पीछे की उदासी को वह पल भर में भाँप लेता है?

आत्माओं के कनेक्शन से उपजे कुछ खूबसूरत रिश्ते समाज के बंधनों से परे होते हैं। ‘बेहया’ कहानी है सिया और अभिज्ञान के इसी अनकहे, अनजान और अनगढ़े रिश्ते की।

पत्रकारिता में परास्नातक विनीता ने करियर की शुरुआत जनसत्ता से की और दैनिक जागरण ग्रुप, नेटवर्क 18 ग्रुप के साथ भी काम किया है। टीवी उन्हें रास नहीं आया तो 2006 में विनीता ने सक्रिय पत्रकारिता को अलविदा कह दिया और पूरी तरह से अध्यापन के क्षेत्र में आ गईं। पिछले 17 सालों में वो कई नामी-गिरामी मीडिया संस्थानों में अध्यापन कर चुकी हैं। विनीता, कंसलटेंट के तौर पर नए संस्थानों की स्थापना और प्रासंगिक पाठ्यक्रम बनाने का कार्य भी करती हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भारत को विश्व मानचित्र पर पहुँचाने के अपने सपने के ख़ातिर, अक्टूबर 2019 में उन्होंने आईआईएमसी छोड़ने के साथ ही अध्यापन पर भी अल्पविराम लगा दिया। फ़िलहाल वो शिक्षा मंत्रालय की प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय छात्रवृत्ति योजना पर, आईआईटी में काम कर रही हैं। ख़ुद को न्यूज़ राइटर मानने वाली विनीता पठन और पाठन को लेकर बेहद संजीदा हैं। उनका काम उन्हें रोज़ नए किरदार और जीवित कहानियों से मिलने का अवसर देता है। ‘बेहया!’ उन्हीं जीवित कहानियों और किरदारों का एक अंश है।