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बात बनेचर
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ISBN: 9788195217120 SKU: SV918 Category:

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20 reviews for बात बनेचर

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    उदय कमल साहित्य संगम

    बात बनेचर यकीनन एक उम्दा कृति है।

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    Ravi Upadhyay

    Kitab ki sabhi kahani Jiwan jine ki kala sikhati hai.

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    Prakash kumar ram (सहपाठी)

    कम शब्दों में कहूँ तो एक पठनीय, कई सारी सीख सीखा जाने वाली अविस्मरणीय पुस्तक है बात बनेचर। जिसे हर एक सुधि पाठक को अवश्य अवश्य पढ़ना ही चाहिए।

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    साहित्य विमर्श (store manager)

    #बनकिस्सा और #बात_बनेचर बस नाम अलग हैं पर दोनों एक ही #नेचर की किताब है …. हाँ दूसरी किताब पहले से ज्यादा रोचक और आकर्षक बनी है । Sunil Kumar Sinkretik जी द्वारा लिखित इन दोनों किताबों में शामिल कहानियों में आपको जीवन का सार मिलेगा । जैसा कि मैंने पहले ही पुस्तक परिचय में लिखा था कि वन्य जीवों की भाषा में मानवीय मूल्यों को झकझोरने वाली किताब है । हर कहानी एक नयी अवधारणा, सोच और सिद्धांतो से लबरेज है .. हाँ यह सही है कि वह बिल्कुल आपके जीवन से जुड़ी हुई या आसपास के लोगों , घटनाओं, स्थिति-परिस्थितियों या चीजों से स्पष्ट संबंधित नजर आएगी । कुछ कहानियों के भाव आपको सचेत , विवेकवान और समृद्ध बनाएगा तो कुछ आपके विचारों को जोरदार टक्कर मारकर उसे सुधारने और परिशुद्ध करने की कोशिश करेगा । हमारे समाज या संसार में उत्पन्न हो रही विसंगतियों का एकमात्र कारण है लोगों का अपने सिद्धांतो से डिग कर स्वयं को या अपने स्वार्थ को सर्वोच्च स्थान पर स्थापित करना … समस्त चालाक लोग एकीकरण की जगह ध्रुवीकरण की अग्नि में सारे मापदंडो को झोंकने में लगे हैं जो एक बड़ी त्रासदी है… लेखक द्वारा इतने सहज शब्दों में समस्त मानवीय दुर्गुणों और दुराचारों को वन्यजीवों की भाषा में उल्लेखित करना एवं उसके उपचार के रास्तों का रेखांकित करना वाकई अद्भुत कल्पनाशीलता का परिचय है । मैं अब तक मिले दो लोगों एक मेरे पिता और दूसरा Triloki Nath Diwakar जी की कल्पनाशीलता से काफी प्रभावित रहा हूँ … ये दो ऐसे लोग हैं मेरे परिचय में जो कभी भी किसी भी विषय वस्तु पर एक नयी कहानी गढ़ देते हैं.. और सामने वाले को सहज ही अपने प्रभाव में कर लेते हैं । और अब ये तीसरे शख्स हैं जिनकी कल्पनाशीलता मुझे सीधे प्रभावित कर रही है । बनकिस्सा से चला कहानियों का सफर बात बनेचर के बाद भी जारी रहेगा ऐसा मुझे अंदाजा ही नहीं पूरा यकीन है क्योंकि लेखक कहानियों का राजा मालूम जान पड़ता है । आज के समय में जब लोग खुद ही खुद में या कहूँ तो सोशल मीडिया के आभासी दुनियां में इस कदर मगन हैं कि उनके आसपास क्या चल रहा है या क्या कुछ है जो वे नजरअंदाज कर रहे हैं इसका पता ही नहीं चल रहा है उस दौर में इन्होने एक कथावाचक और दो हमेशा उत्सुक होकर कहानी सुनने वाले श्रोताओं के माध्यम से जिन – जिन बातों को उकेरा है … वह सराहनीय तो है साथ ही अतुलनीय और अकल्पनीय भी है । हम जब छोटे थे तो कभी दादा तो कभी दादी के सीने लग काफी कहानियां सुना करते थे जिसका हमारे मानस पटल पर गहरा प्रभाव पड़ा है .. अपने मूल्यों और सिद्धांतो की आधारशिला कहीं ना कहीं वहीं से स्थापित हुई है । उनलोगों के साथ ही अपने माता-पिता के व्यक्तित्व और सिद्धातों से विचारों और व्यवहारों के साथ ही सिद्धातों में संबलता मिली है । ज्ञान हमेशा ऊँचे मापदंडो और सच्चे रास्तों की ओर निर्देशित करता है .. मुश्किलें और परेशानियां सिद्धातों से डिगाने की कोशिश भले करते हैं पर वह जो उच्च सिद्धातों के द्वारा पोषित संस्कार अंदर स्थापित है वह बिखरने से, सच कहूँ तो मिटने से बचा लेता है । ये दोनों पुस्तकें मानवों के उच्च आदर्शों को स्थापित और पोषित करने वाले हैं । साथ ही कुछ वैसे भी वन्यजीवों के नामों, गुणों और व्यवहारों को आपको जानने को मिलेगा जो आपको रोमांचित करेगा , हाँ हिन्दी के कुछ वैसे शब्द जो आम बोलचाल में शामिल नहीं है वह आपको नया और थोड़ा परेशान करने वाला लगेगा …. परंतु दूसरी किताब में लेखक ने इस बात का ध्यान रखा है और ज्यादातर कठिन शब्दों के अर्थ किताब के आखिर में लिख दिया है । पहली किताब पढ़ने के बाद समय नहीं मिल पाया था कि अपने अनुभव आपसबों से साझा कर सकूं इसलिए सामूहिक रूप से आज लिख दिया और यह काफी है क्योंकि दोनों किताबों का थीम और उद्देश्य बिल्कुल समान है ।
    आज के लिए बस इतना ही ।
    आपके स्नेह की अपेक्षा में आपका मित्र
    जय कृष्ण कुमार

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    अनूप सिंह (सहपाठी)

    बात बनेचर
    जंगल में बहुत घूमना तो नहीं हो पाया है लेकिन जंगल को शब्द दृश्य से कथा के जीवंत चित्र रूप में देखने का अवसर इस पुस्तक ने दिला दिया । यह सर्वविदित ही है कि हरेक कहानी कोई संदेश, भाव और संवेदना को लिए रहती है उसी तरह बात बनेचर की भी हर कहानी हमारे सांसारिक मूल्यों के पतन , परिवर्तन और प्रगतिशील प्रवाह को बनाये रखते हुए जंगल में ले जाती है हमारे अपने भीतर के जंगल को साधने की कोशिश के साथ ।
    कुछ कहानियाँ तो ऐसी हैं जो आज राजनीतिक हो चुके देश में ज्यादा प्रासंगिक हो जाती हैं —
    इनमें एक है ‘ कानून का राज ‘ — जिसमें एक हिरण परिस्थितिवश मनुष्यों के कटघरे में आ जाता है और उसे स्वयं को निर्दोष साबित करने की जद्दोजहद करनी पड़ती है । कहानी एक पल को यह सोचने पर विवश जरूर कर देगी कि जंगल का कानून हमारे वाले से कहीं ज्यादा अच्छा तो नहीं ।
    मनुष्यों को किसकी जरूरत होनी चाहिए? इसका उत्तर भी ‘ बैल और कुत्ता ‘ कहानी दे देगी ।
    वर्तमान समय में सभी को लोकप्रिय होने की हवस चढ़ी है जिस पर सबसे सशक्त कटाक्ष करती कहानी ‘ राजा कौन ‘ हमें पढ़नी चाहिए। मोटिवेशन तो जो मिलेगा वो अलग , अपने आपको थोड़ा और गहरा बनाने की भूख जरूर जगेगी । उदाहरण के लिए एक दो वाक्य पर्याप्त होंगे – ‘ राजा दावे नहीं करता । उसे दंभ भरने की जरूरत नहीं होती ।
    ‘ राजा न स्पर्धा करता है , न राजा का कोई स्पर्धी होता है । ‘
    बाकी कहानियों से भी जीवन के लिए पोषक बातें मिलेंगी जैसे – ‘ जीने का अर्थ है – नवाचार ‘ ।
    कई बार लेखक अपनी व्यक्त शैली के अनूठेपन से चौंकाता और सीखाता भी है । एक स्थिर स्थिति को व्यक्त करता उसका ये वाक्य कि – ‘ अगले पल में यहाँ ऐसा कुछ भी न होता था , जो पिछले पल में न हुआ हो । ‘
    लेखक Sunil Kumar Sinkretik को भविष्य के लिए शुभकामनाएँ इस अपेक्षा और आग्रह के साथ कि वो आगे जंगल पर उपन्यास भी लिखें जिससे हम न केवल पूरा चलचित्र देंखे बल्कि हमारा जंगल से दूरी भी दूरी न रहे ।
    और प्रकाशक साहित्य विमर्श को भी बहुत बहुत साधुवाद कि अपनी इस यात्रा को सफल के साथ साथ सार्थक भी बनाएँ और इस तरह के नवोन्मेष को अवसर देते रहें । बस एक सुझाव था कि कठिन शब्दों का अर्थ अगर पीछे के पृष्ठ पर न देकर उसी पृष्ठ पर नीचे दे दिया जाय तो अध्ययन का आनंद बढ़ जायेगा । धन्यवाद ।
    – अनूप सिंह
    #बातबनेचर #साहित्य

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Book Details

Weight 190 g
Dimensions 20.5 × 12.7 × 1.3 cm
पृष्ठ संख्या

216

भाषा

हिन्दी

बाइंडिंग

पेपरबैक

Pages:   

“उस जीवन पर क्या गर्व करना जिसमें गिनाने के लिए वर्षों की संख्या के सिवा कुछ न हो। बदलाव में जिंदगी है, ठहराव में नहीं।”
– बात बनेचर
बात बनेचर वो किताब है कि जब इसका पहला पन्ना खोलो तो ऐसा लगता है मानों जंगल के प्रवेश द्वार पर खड़े हो और पंछियों की, पशुओं की आवाज़ें अंदर बुला रही हों। एक बार इसकी कोई भी कहानी पढ़ने की देर नहीं है कि ख़ुद कहाँ बैठे हैं, कितनी देर से पढ़ रहे हैं, ये भी याद नहीं रहता।

सुनील कुमार ‘सिंक्रेटिक’ मूल रूप से भोजपुर, बिहार के रहनेवाले। वर्तमान में राज्य सरकार में पदाधिकारी। बचपन से जीव-जंतुओं, वन्य प्राणियों में रुचि रही। वर्तमान हिन्दी में अपनी विधा के एक मात्र लेखक हैं। सब किस्सा लिखते हैं, ये बन किस्सा। इनकी प्रसिद्धि इंसानी चरित्र के मुताबिक जानवरों को ढूंढकर ऐसी कहानी गढ़ने की है कि जंगल का सामान्य सा किस्सा, कब मनुष्य का जीवन-किस्सा बन जाता है, पता ही नहीं चलता। विजुअल मोड इनकी लेखनी की विशेष शैली है। पढ़ने के साथ कहानी आँखों के सामने घूमने लगती है। इनकी पहली किताब ‘बनकिस्सा’ पाठकों के बीच ‘मॉडर्न पंचतंत्र’ के रूप में विख्यात है। ‘बात बनेचर’ उसी परंपरा की अगली किताब है