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अग्निपाखी
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    anurag.eib

    Achhi lagi kahani

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“अरे आय एम् सीरियस। तुमने मुझे ऐसे धक्का न दिया होता तो मैं छलाँग लगाना कैसे सीखती? इसलिए थैंक यू!” – कहानी ‘कॉन्टैक्ट्स‘ से

“वो ही क्यों, हर स्त्री अग्निपाखी है। पूरा आसमान उसका है। उसकी उड़ान या आसमान तय करने का हक़ किसी को नहीं। किसी को भी नहीं।” – कहानी ‘अग्निपाखी‘ से

धनक के सातों रंगों से बनी, सबसे अनोखी, भारतीय स्त्रियों पर लिखी आठ कहानियाँ संजोये आपके समक्ष प्रस्तुत है कहानी संग्रह ‘अग्निपाखी’। आठ अलग-अलग कहानियों में अपनी ज़िंदगी जीतीं, अलग-अलग चुनौतियों का सामना करतीं ‘अग्निपाखी’ की नायिकाएँ स्नेही, संवेदनशील बेटी, बहन, प्रेमिका, पत्नी, माँ और बहू हैं, पर इनके साथ वे ज्वालजयी स्त्रियाँ हैं, जिनकी अपनी पहचान है, जिनका अपना आसमान है। भारतीय स्त्री के अग्नि तत्व को समर्पित, ‘अग्निपाखी’।

अंशु विश्व प्रसिद्ध जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कनाडा, अमेरिका तथा लैटिन अमेरिका अध्ययन केंद्र, अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध संस्थान में सहायक प्राध्यापक हैं। वे यहीं के कूटनीति तथा निशस्त्रीकरण केंद्र से डॉक्टरेट हैं। अपने विषय के अलावा विभिन्न समसामयिक मुद्दों पर लिखे उनके सौ से भी अधिक लेख प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय तथा राष्ट्रीय शोध जर्नल्स, समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पढ़ाने वाली अंशु की आत्मा के साथ हिंदी साहित्य ऐसे ही जुड़ा है जैसे चाय के साथ बिस्किट। "अग्निपाखी" उनका पहला कहानी संग्रह है, पर हिंदी साहित्य में दूसरा विनम्र प्रयास। इसके पहले आया उनका प्रथम उपन्यास "जे एन यू में एक लड़की रहती थी" पाठकों द्वारा खूब सराहा गया। इसे गुजरात साहित्य अकादेमी द्वारा गुजराती में अनुवादित करा "जे एन यू मा आकांक्षा" नाम से प्रकाशित किया गया जिसे गुजरात के पाठकों का भी ढेर सारा स्नेह प्राप्त हुआ। लिखने और बोलने का चाव तो उन्हें बचपन से रहा ही है, अंशु लम्बे समय तक आकाशवाणी के एफ एम् गोल्ड चैनल के साथ प्रेज़ेंटर के रूप में भी जुड़ी रही हैं। शायद यहीं से कहानी-किस्से लिखने और कहने की कला उनके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा बन गई। उन्होंने टी सी एस तथा टेक महिंद्रा जैसी प्रतिष्ठित आय टी कंपनियों में भी काम किया है जहाँ से अपनी उत्कृष्टता के लिए उन्हें कई पुरस्कार मिले हैं। बकौल अंशु, वे जब कुछ नहीं कर रही होतीं, तब भी वे कहानियों के, किस्सों, पात्रों के धागे सुलझाती रहती हैं जो उन्हें अपनी ज़िंदगी से ही मिलते हैं, ताकि अपने पाठकों के लिए कुछ बुन सकें। पढ़ कर, पढ़ा कर, लिख कर और पुरानी फ़िल्में देख कर खुश रहने वाली अंशु अपने पति जसवंत और बेटे युवान के साथ दिल्ली में रहती हैं।