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आदि शंकराचार्य
प्रकाशक: सन्मति प्रकाशन

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Age Recommendation: Above 12 Years
ISBN: 978-9390539154 SKU: SM2258 Category:

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आदि शंकराचार्य – प्रायः सभी महापुरुषों के बारे में अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हो जाती हैं, शंकर के बारे में भी प्रचलित हुईं । इन किंवदंतियों की हम अवहेलना भी कर दें तो भी उनका कृतित्व स्वयं में एक बहुत बड़ी किंवदंती के रूप में सामने आता है । जन-सामान्य में आचार्य शंकर को भगवान शंकर का अवतार माना जाता है । यदि हमारे आधुनिक संस्कार यह मानने को तैयार न हों, तब तो आचार्य का व्यक्तित्व और भी ऊँचा हो जाता है। मात्र बत्तीस वर्ष के जीवन में जो उन्होने किया वह कोई पौराणिक आख्यान नहीं अपितु इतिहास सम्मत घटना है जिसे नकारा नहीं जा सकता । आदि शंकराचार्य ने चरमराई सामाजिक व्यवस्था को पुनर्जीवन दिया, दबे-कुचले वर्ग को सम्मान दिया, और यह स्थापित करने में सफलता पाई कि जितने भी मत समय-समय पर उभरे और अलग-अलग संप्रदायों के रूप में आकर हिन्दू समाज को विभक्त कर दिये, वो सब वास्तव में हिन्दू दर्शन में पहले से ही समाहित थे । शंकर सर्वसामान्य हुए, प्रतिष्ठित हुए । दूसरी बड़ी विचित्रता थी कि उन्होंने भीषण यात्राओं कीं।

आदि शंकराचार्य

Book Details

Weight 100 g
Dimensions 12 × 1.5 × 19 cm
Pages:   

प्रायः सभी महापुरुषों के बारे में अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हो जाती हैं, शंकर के बारे में भी प्रचलित हुईं । इन किंवदंतियों की हम अवहेलना भी कर दें तो भी उनका कृतित्व स्वयं में एक बहुत बड़ी किंवदंती के रूप में सामने आता है । जन-सामान्य में आचार्य शंकर को भगवान शंकर का अवतार माना जाता है । यदि हमारे आधुनिक संस्कार यह मानने को तैयार न हों, तब तो आचार्य का व्यक्तित्व और भी ऊँचा हो जाता है। मात्र बत्तीस वर्ष के जीवन में जो उन्होने किया वह कोई पौराणिक आख्यान नहीं अपितु इतिहास सम्मत घटना है जिसे नकारा नहीं जा सकता । शंकराचार्य ने चरमराई सामाजिक व्यवस्था को पुनर्जीवन दिया, दबे-कुचले वर्ग को सम्मान दिया, और यह स्थापित करने में सफलता पाई कि जितने भी मत समय-समय पर उभरे और अलग-अलग संप्रदायों के रूप में आकर हिन्दू समाज को विभक्त कर दिये, वो सब वास्तव में हिन्दू दर्शन में पहले से ही समाहित थे । शंकर सर्वसामान्य हुए, प्रतिष्ठित हुए । दूसरी बड़ी विचित्रता थी कि उन्होंने भीषण यात्राओं कीं।

साहित्य कला परिषद दिल्ली सरकार द्वारा तीन बार मोहन राकेश पुरस्कार प्राप्त- मुझे अमृता चाहिए (वर्ष 2002), केशवलीला रामरंगीला (वर्ष 2011) एवं चैथी सिगरेट (वर्ष 2018)। आकाशवाणी महानिदेशालय नई दिल्ली द्वारा दो रेडियो नाटक अखिल भारतीय स्तर पर पुरस्कृत - शत्रुगंध (2002) और लकड़ी का पुल (2016)। रीवा नरेश महाराज विश्वनाथसिंह रचित हिंदी के प्रथम नाटक आनंद रघुनंदन का संपादन व बघेली रूपांतरण। बाणभट्ट कृत कादंबरी का संपादन व हिंदी नाट्यांतरण। अब तक 60 से अधिक रेडियो नाटक और 44 मंचीय नाटकों का लेखन। अब तक देश के विभिन्न नगरों- महानगरों में लगभग 40 निर्देशकों के द्वारा दो सौ मंचन